ईरान का मिसाइल विकास और जनवादी कोरिया


अगर ईरान के मिसाइल विकास और उसमे जनवादी कोरिया के योगदान की बात की जाए तो उससे संबंधित एक तस्वीर सामने आती है. 


इस तस्वीर में जनवादी कोरिया के राष्ट्रपति कॉमरेड किम इल संग  और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के अधिकारी एक साथ खड़े थे. उनमें से एक हसन तेहरानी मोकद्दम भी थे, जिन्हें बाद में ‘ईरानी मिसाइलों का पिता’ कहा जाने लगा. तस्वीर कब और कहाँ खींची गई थी, इसकी सटीक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन तस्वीर में दिखाई देने वाले व्यक्ति के तेहरानी मोकद्दम होने और कॉमरेड किम इल संग  से मिलने वाले ईरानी सैन्य प्रतिनिधिमंडल के सदस्य होने की बात की पुष्टि होती है. इस ब्लैक एंड वाइट तस्वीर में सबसे नीचे की पंक्ति में दाईं ओर से पहले व्यक्ति मोकद्दम हैं.

तस्वीर इतिहास की पूरी कहानी नहीं होती, लेकिन कभी-कभी वह आधिकारिक दस्तावेजों की तुलना में इतिहास और उस दौर को अधिक स्पष्ट रूप से दिखाती है. यह तस्वीर संकेत देती है कि 1980 के दशक में जनवादी कोरिया और ईरान केवल हथियार खरीदने-बेचने वाले संबंध में नहीं थे. दोनों देशों के बीच हथियारों के हस्तांतरण, उत्पादन सुविधाओं के निर्माण, तकनीशियनों की तैनाती, सैन्य प्रशिक्षण और युद्धोत्तर सुधारों को समेटने वाली दीर्घकालिक सहयोग की रूपरेखा बन रही थी.

आज ईरान के मिसाइल भंडार और भूमिगत भंडारण सुविधाएँ अमेरिका और इज़राइल के हमलों के विरुद्ध युद्ध की स्थिति को पलटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. ईरान अमेरिका और इज़राइल की तुलना में वायु शक्ति, उपग्रह निगरानी और लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता में कमजोर है. लेकिन उसने मिसाइलों को बिखरे हुए स्थानों पर तैनात किया है और उन्हें भूमिगत रखा है तथा लॉन्चरों और उत्पादन सुविधाओं को कई क्षेत्रों में विभाजित कर दिया है. इस तरह की संरचना बनाई गई है कि किसी एक स्थान पर हमला होने के बावजूद उसकी पूरी सैन्य क्षमता को समाप्त करना कठिन हो.

अमेरिकी हवाई हमलों के बावजूद ईरान के मिसाइल भंडार नष्ट नहीं हुए और ईरान लगातार प्रतिद्वंद्वी के सैन्य ठिकानों तथा प्रमुख सुविधाओं पर हमला करता रहा, जिससे उसने अमेरिका की सैन्य श्रेष्ठता को लागत और जोखिम की समस्या में बदल दिया.

इसके पीछे 1980 के दशक से चली आ रही जनवादी कोरिया  और ईरान की साझेदारी थी. यह कहना उचित नहीं होगा कि ईरान की सभी मिसाइल तकनीक जनवादी कोरिया  से आई है. यह मानना अधिक उचित है कि ईरान का स्वतंत्र अनुसंधान तथा चीन और रूस के माध्यम से तकनीक तक पहुँच भी इसमें शामिल रही है. लेकिन जब ईरान की तरल-ईंधन बैलिस्टिक मिसाइलों की श्रृंखला का अध्ययन किया जाता है, तो स्कड और रोडोंग मिसाइलें तथा जनवादी कोरिया  की उत्पादन तकनीक बार-बार सामने आती हैं.

ईरान का मिसाइल विकास इराक के साथ युद्ध के ठोस युद्ध अनुभव से शुरू हुआ. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान सैन्य रूप से अलग-थलग पड़ गया. नवंबर 1979 में तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास में बंधक संकट पैदा होने के बाद अमेरिका ने ईरान की संपत्तियाँ फ्रीज कर दीं और हथियारों तथा सैन्य सामग्री के निर्यात पर रोक लगा दी. सितंबर 1980 में जब इराक ने ईरान पर हमला किया, तब ईरानी सेना की कमान प्रणाली, उपकरण और कलपुर्जों की आपूर्ति-व्यवस्था सभी अस्थिर थे. क्रांति के तुरंत बाद पुराने सैन्य अधिकारियों को हटा दिया गया था और उसके पास मौजूद अमेरिकी निर्मित लड़ाकू विमानों तथा हथियारों के रखरखाव के लिए आवश्यक कलपुर्जे प्राप्त करना भी कठिन था. इसके विपरीत, इराक को सोवियत संघ और फ्रांस आदि से हथियारों की आपूर्ति मिल रही थी. उसने स्कड मिसाइलों और फ्रॉग रॉकेटों का उपयोग करके ईरान पर हमला किया.

ईरान शुरू से ही बैलिस्टिक मिसाइल रखने वाला देश नहीं था. 12 मार्च 1985 को तड़के 3 बजकर 20 मिनट पर ईरान ने लीबियाई तकनीशियनों की सहायता से इराक के किरकुक के आसपास के क्षेत्र की ओर पहली बार स्कड-B मिसाइल दागी. ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईरान ने कुल 117 बार स्कड मिसाइलें दागी थीं, ऐसा अनुमान है.

ईरान का पहला मिसाइल हमला केवल सैन्य प्रभाव के लिए नहीं था. यह एक संकेत था कि यदि इराक ईरानी शहरों पर हमला करता है तो ईरान भी इराकी शहरों पर हमला कर सकता है. जिस देश के लिए लड़ाकू विमान और वायुसेना के ठिकाने बनाए रखना कठिन हो, उसके पास प्रतिद्वंद्वी के पीछे के क्षेत्रों और शहरों पर हमला करने के सीमित विकल्प होते हैं और बैलिस्टिक मिसाइलों ने उस कमी को पूरा किया.

लेकिन लीबिया के साथ संबंध लंबे समय तक नहीं चले. ईरान ने लीबिया के साथ हुए समझौते के अनुसार सऊदी अरब पर हमला नहीं किया, इस कारण लीबिया ने सहायता बंद कर दी और ईरान के पास मौजूद कुछ स्कड मिसाइलों को निष्क्रिय करने का प्रयास भी किया. ईरान को फिर से मिसाइलें हासिल करनी पड़ीं. इसी प्रक्रिया में हसन तेहरानी मोकद्दम सामने आए.

तेहरानी मोकद्दम ने लीबिया से लाई गई स्कड मिसाइलों को खोलकर उनका रिवर्स इंजीनियरिंग करने के काम का नेतृत्व किया. उन्होंने मिसाइल की संरचना को समझने, कलपुर्जे हासिल करने और प्रक्षेपास्त्र को दोबारा संचालित करने की तकनीकी व्यवस्था विकसित की. यही कारण है कि उन्हें विदेशी देशों से तैयार उत्पाद खरीदने के चरण से आगे बढ़कर घरेलू उत्पादन और सुधार की दिशा में जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला माना जाता है. इसके बाद 11 जनवरी 1987 को ईरान विदेशी प्रत्यक्ष सहायता के बिना स्कड मिसाइल दागने में सफल हुआ.

इसके बाद जनवादी कोरिया  एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में सामने आया. 1987 में ईरान ने जनवादी कोरिया  से लगभग 100 मिसाइलें प्राप्त की थीं, ऐसा बताया जाता है. इन मिसाइलों का उपयोग ईरान-इराक युद्ध के अंतिम दौर में किया गया. युद्ध के दौरान ईरान को जनवादी कोरिया  से स्कड-B सहित हथियार और कलपुर्जे मिले.

स्कड से कियाम तक

जनवादी कोरिया  और ईरान का मिसाइल सहयोग तैयार मिसाइलों के निर्यात तक सीमित नहीं रहा. ईरान जनवादी कोरिया  से प्राप्त मिसाइलों का स्वयं संचालन करने के साथ-साथ उत्पादन तकनीक हासिल करना चाहता था.

ईरान ने जनवादी कोरिया  की ह्वासोंग-5 मिसाइलें आयात कीं और उनका उपयोग इराक के साथ युद्ध में किया. साथ ही उसने उत्पादन तकनीक भी हासिल की. इसी समय ईरान ने स्वयं मिसाइलों का उत्पादन करने की आधारभूत क्षमता तैयार की.

कुछ स्रोतों में यह भी कहा गया है कि 1983 में दोनों देशों ने बैलिस्टिक मिसाइल विकास में पारस्परिक सहायता का समझौता किया था. ईरान ने जनवादी कोरिया  को मिसाइल विकास के लिए आवश्यक धन और उपकरण उपलब्ध कराए और जनवादी कोरिया  ने इसके आधार पर स्कड श्रृंखला की मिसाइलों के उत्पादन और सुधार को आगे बढ़ाया. 1984 में जनवादी कोरिया  ने स्कड-B की नकल और सुधार पर आधारित ह्वासोंग-5 का सफल प्रक्षेपण किया और 1987 से इसका उत्पादन शुरू किया गया, ऐसा बताया जाता है. ईरान ने लगभग 100 ह्वासोंग-5 मिसाइलें खरीदी थीं, ऐसा रिपोर्टों में कहा गया है.

ईरान ने जनवादी कोरिया  द्वारा प्रदान की गई मिसाइलों को केवल भंडारित करके नहीं रखा. उसने उन्हें अपने भूगोल और संचालन की परिस्थितियों के अनुरूप संशोधित किया. स्कड-B की मारक दूरी लगभग 300 किलोमीटर और स्कड-C की लगभग 500 किलोमीटर मानी जाती है. ईरान ने मारक दूरी, वारहेड और प्रक्षेपास्त्र की संरचना में सुधार करते हुए मिसाइलों को अपनी सैन्य प्रणाली में शामिल किया.

1990 के दशक के प्रारंभ में जनवादी कोरिया  ने ईरान को अतिरिक्त स्कड-C मिसाइलें और मोबाइल लॉन्च वाहन उपलब्ध कराए. प्रोफेसर ब्रूस बेक्टोल के विश्लेषण के अनुसार, जनवादी कोरिया  ने 1994 तक ईरान को लगभग 200 स्कड-C मिसाइलें उपलब्ध कराई थीं और इसके बाद ईरान के भीतर स्कड-C उत्पादन सुविधा के निर्माण में ईरान के साथ सहयोग किया. उनके अनुसार उस सुविधा के लिए जनवादी कोरिया ई कलपुर्जों और तकनीकी सहायता की आवश्यकता बनी रही.

इस उत्पादन आधार से विकसित प्रमुख उन्नत मिसाइलों में से एक कियाम है. कियाम को स्कड श्रृंखला की तकनीकी विरासत मिली, लेकिन ईरान ने इसे अपनी उत्पादन प्रणाली और परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित किया. इसे लगभग 800 किलोमीटर की मारक दूरी वाली कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल माना जाता है और ईरान ने इसे भूमिगत भंडारण सुविधाओं तथा मोबाइल लॉन्चरों से संचालित किया है.

कियाम का महत्व केवल उसके आँकड़ों या बाहरी स्वरूप में नहीं है. इसका अर्थ यह है कि ईरान अब ऐसा देश नहीं रहा जो विदेशों से मिसाइलें खरीदता हो. जनवादी कोरिया  से तैयार मिसाइलें और तकनीक प्राप्त करने के बावजूद ईरान ने उत्पादन सुविधाएँ स्थापित कीं, कलपुर्जों का स्वदेशीकरण किया और संचालन का अनुभव हासिल किया. जनवादी कोरिया से हुआ तकनीकी हस्तांतरण ईरान के सैन्य उद्योग के प्रारंभिक आधार में बदल गया.

इस प्रक्रिया में तकनीशियनों की तैनाती भी शामिल थी. कुछ विश्लेषणों के अनुसार जनवादी कोरिया  और चीन ने 1997 में 100 से अधिक तकनीशियनों को ईरान भेजकर उसे बैलिस्टिक मिसाइलों के स्वदेशी उत्पादन की क्षमता विकसित करने में सहायता दी. इस दावे के विस्तृत विवरण की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह उस तथ्य के अनुरूप है कि उस समय ईरान ने उत्पादन सुविधाएँ और विनिर्माण प्रक्रियाएँ हासिल करने के लिए बड़े प्रयास किए थे.

केवल एक डिजाइन ड्रॉइंग से मिसाइल तकनीक पूरी नहीं हो जाती. ईंधन मिश्रण की प्रक्रिया, इंजन ढालने की विधि, वाल्व और पंपों की टिकाऊपन जाँचने की तकनीक, मार्गदर्शन प्रणाली की त्रुटि कम करने की विधि और मोबाइल लॉन्च वाहन संचालित करने की प्रक्रियाएँ—इन सबकी समग्र आवश्यकता होती है. मिसाइल खरीदकर उसका संचालन करना और मिसाइल उद्योग का मालिक होना बिल्कुल अलग बातें हैं. जनवादी कोरिया  की भूमिका तैयार उत्पाद उपलब्ध कराने से आगे बढ़कर ईरान में उस औद्योगिक आधार को स्थापित करने तक थी.

रोडोंग से शहाब-3 तक

1990 के दशक के उत्तरार्ध से दोनों देशों के सहयोग का केंद्र स्कड श्रृंखला से रोडोंग मिसाइल श्रृंखला की ओर स्थानांतरित हो गया.

जनवादी कोरिया  ने 29 मई 1993 को रोडोंग-1 मिसाइल का परीक्षण किया. जनवादी कोरियाई सरकार ने इस प्रक्षेपण का उपयोग परमाणु मुद्दे से संबंधित राजनीतिक संकेत के रूप में किया, लेकिन इसका उद्देश्य सैन्य तकनीक और निर्यात की संभावनाओं का परीक्षण करना भी था. उस समय ईरान और पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल परीक्षण को देखने के लिए मौजूद थे. ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने उसी वर्ष मार्च में फ्यंगयांग का दौरा किया था और बैलिस्टिक मिसाइल सहयोग तथा रोडोंग मिसाइल के मुद्दे पर चर्चा की थी.

रोडोंग मिसाइल को लगभग 1,000 किलोमीटर की मारक दूरी वाली मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है. अमेरिकी और पश्चिमी विश्लेषणों के अनुसार, जनवादी कोरिया  ने 1990 के दशक के उत्तरार्ध में ईरान को लगभग 150 रोडोंग मिसाइलें हस्तांतरित कीं. ईरान ने इन्हें शहाब-3 नाम से संचालित करना शुरू किया. अमेरिका के FDD (Foundation for Defense of Democracies) की रिपोर्ट का आकलन है कि जनवादी कोरिया  ईरान की पहली परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल, रोडोंग-A, के विकास और हस्तांतरण में शामिल था और ईरान ने इसे शहाब-3 के रूप में उत्पादित किया. बाद में शहाब-3 ईरान की तरल-ईंधन मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान के विकास का आधार बना.

शहाब-3 और रोडोंग मिसाइलों के बीच समानता की ओर बाहरी विशेषज्ञ लंबे समय से संकेत करते रहे हैं. हाल के विश्लेषणों में भी यह आकलन सामने आया है कि शहाब-3 श्रृंखला की ग़द्र और इमाद मिसाइलें जनवादी कोरिया  की रोडोंग मिसाइल पर प्रत्यक्ष रूप से आधारित थीं. ईरान की शहाब-3 शुरुआत में रोडोंग मिसाइल की सीधी प्रतिकृति के रूप में सामने आई, लेकिन समय के साथ इसमें ईरान के स्वतंत्र सुधार शामिल होते गए.

ईरान ने शहाब-3 की मारक दूरी और सटीकता बढ़ाई. उसने प्रणोदन(Propulson) प्रणाली और मार्गदर्शन प्रणाली में सुधार किया तथा वारहेड के भार और आकार में बदलाव किया. ग़द्र को शहाब-3 की मारक दूरी बढ़ाने वाले संस्करण के रूप में विकसित किया गया. इमाद में अंतिम चरण में दिशा बदल सकने वाले पुनःप्रवेश वाहन को लागू करके मारक सटीकता बढ़ाने का प्रयास किया गया. इसलिए आज की ग़द्र और इमाद को केवल जनवादी कोरियाई मिसाइलों की प्रतिकृतियाँ कहना सही नहीं होगा. तकनीकी शुरुआत जनवादी कोरिया से हुई थी, लेकिन बाद का विकास ईरान के शोधकर्ताओं और उत्पादन प्रणाली ने किया.

यह अंतर महत्वपूर्ण है. पश्चिमी मीडिया अक्सर ईरानी मिसाइलों को ‘जनवादी कोरिया  निर्मित’ कहता है. इसके विपरीत, ईरान अपनी सभी उपलब्धियों को अपने वैज्ञानिकों की स्वतंत्र उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करता है. लेकिन दोनों पक्ष पूरी तस्वीर नहीं बताते. ईरान की तरल-ईंधन मध्यम दूरी की मिसाइलें जनवादी कोरिया  की रोडोंग श्रृंखला की तकनीक और उत्पादन तकनीक से काफी प्रभावित हुईं. लेकिन यह भी तथ्य है कि ईरान ने 20 से अधिक वर्षों तक प्रणोदन प्रणाली, मार्गदर्शन प्रणाली, वारहेड और विनिर्माण प्रक्रियाओं में सुधार किया है. प्रारंभिक तकनीकी हस्तांतरण और वर्तमान उत्पादन क्षमता को अलग-अलग समझना चाहिए.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय के प्रतिबंध संबंधी रिकॉर्ड दोनों देशों के सहयोग के भौतिक प्रमाण दिखाते हैं. 2007 में अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने कहा कि ईरान के शाहिद हेम्मत इंडस्ट्रियल ग्रुप (SHIG) द्वारा विकसित शहाब श्रृंखला की मध्यम दूरी की मिसाइलें जनवादी कोरिया  द्वारा डिजाइन की गई रोडोंग मिसाइल पर आधारित थीं और उन्हें चीन तथा जनवादी कोरिया  से सहायता मिली थी. 2009 और 2013 के प्रतिबंध संबंधी घोषणाओं में जनवादी कोरिया ई खनन विकास व्यापार निगम, KOMID (कोरिया माइनिंग डेवलपमेंट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन) और SHIG के बीच बैलिस्टिक मिसाइल लेनदेन का उल्लेख किया गया. इसमें तानचोन कमर्शियल बैंक द्वारा वित्तीय लेनदेन को समर्थन देने की बात भी शामिल थी. 2016 में यह रिकॉर्ड सामने आया कि SHIG से जुड़े लोगों ने ईरान में मौजूद KOMID के प्रतिनिधियों के साथ सहयोग किया और तरल-ईंधन बैलिस्टिक मिसाइलों तथा अंतरिक्ष प्रक्षेपण यानों के जमीनी परीक्षण में उपयोग किए जा सकने वाले वाल्व, इलेक्ट्रॉनिक और मापन उपकरणों की खेपों के समन्वय में भूमिका निभाई.

इन दस्तावेजों से जो तथ्य सामने आता है, वह केवल इतना नहीं है कि एक मिसाइल सीमा पार गई. इसका अर्थ यह है कि डिजाइन, कलपुर्जे, वित्त, परिवहन और परीक्षण उपकरण एक ही नेटवर्क के रूप में संचालित हुए. पश्चिमी प्रतिबंधों ने इस नेटवर्क को रोकने का प्रयास किया, लेकिन ईरान और जनवादी कोरिया  ने कंपनियों के नाम बदलकर, मध्यस्थ कंपनियों का उपयोग करके और व्यापार मार्गों को घुमाकर इसका सामना किया. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क पर नियंत्रण रखने वाला अमेरिका मानता था कि वह सभी लेनदेन को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन वास्तविक दुनिया केवल अमेरिका की इच्छा के अनुसार नहीं चलती.

मुसूदान और तरल-ईंधन मिसाइल की वंशावली

2000 के दशक के प्रारंभ में मुसूदान श्रृंखला को लेकर भी संदेह सामने आए. जनवादी कोरिया  की मुसूदान मिसाइल को पूर्व सोवियत पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल R-27 श्रृंखला की तकनीक से संबंधित माना जाता है. ईरान की खोर्रमशहर श्रृंखला को भी R-27 तकनीक से जोड़ा गया है. लेकिन इस क्षेत्र में रोडोंग-शहाब श्रृंखला की तुलना में सार्वजनिक प्रमाण कम हैं.

यह दावा मीडिया में बार-बार किया गया कि जनवादी कोरिया  ने 2005 में ईरान को मुसूदान श्रृंखला की मिसाइलें उपलब्ध कराई थीं, लेकिन सटीक संख्या, हस्तांतरण की विधि और ईरान ने वास्तव में कौन-से डिजाइन तथा कलपुर्जे हासिल किए, यह जानना कठिन है. विशेषज्ञों के बीच भी इस बात पर अलग-अलग राय है कि ईरान की खोर्रमशहर मुसूदान की सीधी प्रतिकृति है या समान तकनीकी वंशावली के आधार पर ईरान द्वारा स्वतंत्र रूप से विकसित मिसाइल है.

इस प्रकार दोनों देशों के मिसाइल सहयोग के इतिहास में तथ्य और अनुमान दोनों मौजूद हैं. लेकिन सभी हिस्सों की पुष्टि न होने के कारण पूरी प्रवृत्ति को नकारा नहीं जा सकता. 1980 के दशक की स्कड-B और ह्वासोंग-5, 1990 के दशक की स्कड-C और उत्पादन सुविधाएँ, 1990 के दशक के उत्तरार्ध की रोडोंग और शहाब-3 तथा बाद में ग़द्र और इमाद तक पहुँचने वाली ईरान की मिसाइल श्रृंखला को विभिन्न रिपोर्टों, प्रतिबंध संबंधी रिकॉर्ड और सैन्य विशेषज्ञों के विश्लेषण में बार-बार दर्ज किया गया है.

और ईरान की पूरी मिसाइल शक्ति को जनवादी कोरिया  के प्रभाव के रूप में भी नहीं समझना चाहिए. ठोस-ईंधन मिसाइलों की अलग वंशावली है. ईरान ने 1990 के दशक में चीन के आधिकारिक समर्थन और बाद में चीनी संस्थानों के माध्यम से तकनीकी पहुँच के आधार पर ठोस-ईंधन प्रणोदन प्रणाली और संबंधित उत्पादन क्षमता विकसित की. इसके अलावा ईरान की ठोस-ईंधन मध्यम दूरी की मिसाइल खैबर शेकेन तथा कुछ मोबाइल मिसाइलों को ईरानी वैज्ञानिकों की स्वतंत्र उपलब्धियों के रूप में माना जाता है. सैन्य विशेषज्ञ भी कहते हैं कि जनवादी कोरिया  और ईरान के बीच संबंध सबसे स्पष्ट रूप से तरल-ईंधन मिसाइलों के क्षेत्र में दिखाई देता है, जबकि ठोस-ईंधन श्रृंखला में जनवादी कोरिया  की प्रत्यक्ष भागीदारी को प्रमाणित करना कठिन है.

इसलिए ईरान के मिसाइल इतिहास को तीन धाराओं में देखना चाहिए. पहली है जनवादी कोरिया  की स्कड और रोडोंग से शुरू हुई तरल-ईंधन बैलिस्टिक मिसाइलें. दूसरी है चीन और रूस के माध्यम से तकनीकी पहुँच और सहयोग. तीसरी है ईरान के अपने अनुसंधान एवं विकास तथा युद्ध अनुभव से विकसित ठोस-ईंधन और सटीक-मार्गदर्शन प्रणालियाँ. इन तीनों तत्वों के संयोजन ने आज की ईरानी मिसाइल शक्ति का निर्माण किया है.

भूमिगत भंडार और नया युद्ध

ईरान की मिसाइलें तकनीक की उपज होने के साथ-साथ युद्ध सिद्धांत की भी उपज हैं. ईरान ने 1980 के दशक में इराक के मिसाइल हमलों का अनुभव किया. तेहरान और ईरान के प्रमुख शहरों पर हमला हुआ, नागरिकों ने शरण ली और युद्ध का भय पूरे समाज को हिला गया. ईरानी नेतृत्व उस समय एक निष्कर्ष पर पहुँचा. उसे फिर कभी बिना मिसाइलों वाला राष्ट्र नहीं बनना है.

ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने इराकी मिसाइल हमलों के दौरान ईरान के पास रक्षा के साधन न होने के अनुभव का कई बार उल्लेख किया है. ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड ने मिसाइलों को प्रतिरोधक क्षमता का मुख्य आधार माना और यह हिसाब लगाया यदि लड़ाकू विमानों और नौसेना के क्षेत्र में अमेरिका से प्रतिस्पर्धा नहीं की जा सकती, तो मिसाइलों के माध्यम से अमेरिकी ठिकानों और सहयोगी देशों को खतरा पैदा करके युद्ध की लागत बढ़ाई जाए.

अमेरिका के FDD की 2023 की रिपोर्ट ने आकलन किया कि ईरान के पास मध्य पूर्व में सबसे बड़ी बैलिस्टिक मिसाइल शक्ति है. 2021 में उस समय अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर केनेथ मैकेंज़ी ने कहा था कि ईरान के पास विभिन्न प्रकारों को मिलाकर 3,000 से कुछ कम मिसाइलें हैं. FDD की रिपोर्ट ने 2015 के परमाणु समझौते के बाद से 2022 तक ईरान द्वारा कम-से-कम 228 बैलिस्टिक मिसाइल और अंतरिक्ष प्रक्षेपण यान प्रक्षेपण किए जाने की गणना की. इनमें कम और मध्यम दूरी की प्रणालियों के परीक्षण, प्रशिक्षण और वास्तविक संचालन सभी शामिल थे.

यह संख्या मिसाइलों की गुणवत्ता को पूरी तरह नहीं बताती. लेकिन इससे यह पता चलता है कि ईरान ऐसा देश नहीं है जिसके पास केवल एक-दो परीक्षण मिसाइलें हों, बल्कि उसने उत्पादन, भंडारण, स्थानांतरण, प्रक्षेपण और पुनःआपूर्ति में सक्षम एक प्रणाली विकसित की है. ईरान की मिसाइलें मोबाइल लॉन्च वाहनों पर तैनात होती हैं और अपनी स्थिति बदलती हैं. कुछ को पर्वतीय क्षेत्रों और भूमिगत सुरंगों में रखा जाता है. लॉन्च ठिकानों और उत्पादन सुविधाओं को कई स्थानों पर फैलाकर इस तरह रखा गया है कि एक ही हवाई हमले में पूरी शक्ति को समाप्त करना कठिन हो.

हाल के अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान द्वारा मिसाइलों से पलटवार करने और अमेरिका तथा इज़राइल के सैन्य दबाव को संतुलित करने का कारण भी यही है. अमेरिका के पास वायुसेना के अड्डे, विमानवाहक पोत, निगरानी उपग्रह और लंबी दूरी के बमवर्षक हैं. इसके मुकाबले ईरान मिसाइलों की संख्या, उनका बिखराव, छिपाव और गतिशीलता इस्तेमाल करता है. यदि अमेरिका ईरान की परमाणु सुविधाओं या सैन्य ठिकानों पर हमला करता है, लेकिन ईरान अपनी मिसाइलों को बचाए रखता है, तो अमेरिकी हमला युद्ध का अंत नहीं बल्कि जवाबी कार्रवाई की शुरुआत बन जाता है.

मिसाइल भंडार ईरान की ‘दूसरी वायुसेना’ के समान हैं. लड़ाकू विमानों के लिए प्रक्षेपण अड्डे, रनवे, रखरखाव सुविधाएँ और पायलट आवश्यक होते हैं. मिसाइलों को भूमिगत छिपाया जा सकता है और प्रक्षेपण से ठीक पहले तक उनकी स्थिति उजागर नहीं करनी पड़ती. स्थिर वायुसेना अड्डों की तुलना में मोबाइल लॉन्चरों का पता लगाना और उन्हें नष्ट करना कठिन होता है. यही वह कारण है जिससे ईरान अमेरिका की भारी वायु श्रेष्ठता के सामने टिक सकता है.

बेशक, मिसाइल युद्ध को निर्णायक रूप से समाप्त करने वाला कोई सर्वशक्तिमान हथियार नहीं है. मिसाइलों को रोका जा सकता है और यदि निगरानी तथा कमान-नियंत्रण नेटवर्क नष्ट हो जाए तो उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है. वारहेड की विनाशकारी शक्ति और सटीकता, प्रक्षेपण की तैयारी का समय और उपलब्ध भंडार भी महत्वपूर्ण कारक हैं. यह भी नहीं कहा जा सकता कि ईरानी मिसाइल हमलों ने अमेरिका और इज़राइल की वायु रक्षा प्रणालियों को पूरी तरह निष्क्रिय कर दिया. लेकिन जब तक मिसाइलें प्रतिद्वंद्वी के सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों, ऊर्जा सुविधाओं और कमान केंद्रों को खतरा पहुँचाती रहेंगी, अमेरिका युद्ध समाप्त नहीं कर सकता. यहीं पर ईरान की मिसाइल रणनीति राजनीतिक प्रभाव प्राप्त करती है.

दूर होते हुए भी निकट दो देश

ईरान और जनवादी कोरिया भौगोलिक रूप से बहुत दूर हैं. एक देश पश्चिमी एशिया में है और दूसरा पूर्वोत्तर एशिया में. उनके धर्म, भाषाएँ और ऐतिहासिक अनुभव भी अलग हैं. ईरान इस्लामी क्रांति से गुजरा, जबकि जनवादी कोरिया ने समाजवादी क्रांति और राष्ट्रीय मुक्ति के अनुभव के आधार पर अपना राज्य बनाया. दोनों देशों की शासन व्यवस्थाएँ भी समान नहीं हैं.

लेकिन अमेरिका-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के विरुद्ध संप्रभुता और सैन्य आत्मनिर्भरता की तलाश करने के दृष्टिकोण से दोनों देश करीब हैं. अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए और जनवादी कोरिया  को अलग-थलग किया. अमेरिका ने ईरान को हथियार खरीदने से रोकने और जनवादी कोरिया  की मिसाइल तकनीक के निर्यात को रोकने का प्रयास किया. लेकिन उस दबाव ने दोनों देशों के संपर्क को समाप्त नहीं किया. बल्कि उसने एक-दूसरे की आवश्यकताओं को बढ़ाया.

ईरान ने जनवादी कोरिया  से स्कड और रोडोंग श्रृंखला की मिसाइलें, उत्पादन तकनीक और तकनीशियनों की सहायता प्राप्त की. जनवादी कोरिया  ने ईरान से विदेशी मुद्रा और कच्चा तेल हासिल किया. ईरान ने जनवादी कोरिया  की तकनीक को अपने सैन्य वातावरण के अनुरूप संशोधित किया. जनवादी कोरिया  ने ईरान के साथ सहयोग के माध्यम से अपने मिसाइल उद्योग के लिए बाहरी बाजार हासिल किया. दोनों पक्ष अपने अस्तित्व के लिए एक-दूसरे का उपयोग करते थे और साथ ही एक-दूसरे की क्षमता बढ़ाने में योगदान देते थे—यह एक प्रकार का पारस्परिक निर्भरता का संबंध था.

आइए अंतरराष्ट्रीय राजनीति की वास्तविकता को ठंडे दिमाग से देखें. अमेरिका और पश्चिम अपनी मिसाइलों और बमबारी को ‘निरोध’ और ‘रक्षा’ कहते हैं, जबकि ईरान और जनवादी कोरिया  के हथियारों पर ‘खतरा’ और ‘अवैध’ का ठप्पा लगाते हैं. अमेरिका दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सैन्य अड्डे स्थापित करता है और अग्रिम (Pre emptive) हमले करता है, फिर भी प्रतिबंधों के माध्यम से दूसरे देशों के रक्षा साधनों को समाप्त करने का प्रयास करता है. अंतरराष्ट्रीय कानून शक्तिशाली देशों की हिंसा को ‘व्यवस्था’ कहता है, लेकिन कमजोर देशों के प्रतिरोध की बात आने पर ‘दंड’ की चर्चा करता है.

इसी दोहरे मानदंड के बीच ईरान और जनवादी कोरिया  का मिसाइल सहयोग विकसित हुआ. दोनों देशों द्वारा आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन की बात करने का कारण भी यही है. उन्होंने अनुभव किया कि बाहरी सैन्य संरक्षण पर निर्भर रहने पर किसी भी समय उन्हें निरस्त्र किया जा सकता है. ईरान-इराक युद्ध ने ईरान को बिना मिसाइलों वाले राष्ट्र की त्रासदी सिखाई. कोरियाई युद्ध और उसके बाद अमेरिका द्वारा लगातार दिए गए परमाणु खतरे ने जनवादी कोरिया  के मन में स्वतंत्र राष्ट्रीय रक्षा क्षमता की आवश्यकता को गहराई से स्थापित किया.

आज ईरान के मिसाइल भंडारों से दागी जाने वाली शहाब-3, ग़द्र, इमाद और कियाम की वंशावली को पीछे की ओर खोजते हुए 1980 के दशक के फ्यंगयांग के सैन्य कारखाने और तेहरान की भूमिगत उत्पादन सुविधाएँ एक साथ दिखाई देती हैं. वहाँ राष्ट्रपति कॉमरेड किम इल संग और ईरानी सैन्य प्रतिनिधिमंडल की मुलाकातें थीं, ईरानी मिसाइलों के पिता तेहरानी मोकद्दम का युवा काल था और अमेरिकी नाकाबंदी को तोड़कर कलपुर्जे और तकनीक पहुँचाने वाले मजदूर और तकनीशियन थे.

जनवादी कोरिया और ईरान के संबंधों को समझना इस बात पर प्रश्न उठाना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था किसने बनाई, हथियार रखने के अधिकार पर एकाधिकार किसने स्थापित किया और दूसरे देशों की रक्षा क्षमता को खतरे के रूप में परिभाषित कौन करता रहा है. अमेरिकी एकध्रुवीय प्रभुत्व केवल सैन्य अड्डों और प्रतिबंधों के बल पर कायम नहीं रह सकता. दुनिया के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्र राष्ट्र अपनी स्वतंत्र सैन्य क्षमताएँ और आर्थिक सहयोग नेटवर्क बना रहे हैं तथा पश्चिम का विरोध कर रहे हैं. जनवादी कोरिया और ईरान उस पहली पंक्ति में अपने-अपने तरीके से एक नए युग का निर्माण कर रहे हैं.

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