चीन पर निर्भरता का मिथक

 जनवादी कोरिया के दुश्मन जनवादी कोरिया को "चीन पर निर्भर" के रूप में चित्रित करना पसंद करते हैं और यहां तक कि वामपंथी कुछ लोग भी इसे दोहराते हैं. इससे भी बदतर, कुछ अति-वामपंथी तत्व यह कहने की कोशिश करते हैं कि जनवादी कोरिया चीन का "नव-उपनिवेश" है और इसी तरह का अन्य बकवास करते हैं. इसके अलावा जनवादी कोरिया के बारे में ऐसी गलत धारणाएं जानबूझकर फैलाने वाले पूंजीपति मुख्यधारा मीडिया और पूंजीपति , भाड़े के बुद्दिजीवियों ,लेखकों के साथ-साथ संशोधनवादी और हठधर्मितावादी तत्व तो हैं हीं.  

 

वास्तव में, 2020 और 2021 में चीन के साथ व्यापार लगभग समाप्त हो गया था और अब भी यह जनवादी कोरिया में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल एक छोटा प्रतिशत है.

 


क्योंकि जनवादी कोरिया एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था है, विदेशी व्यापार जीडीपी का केवल 5 प्रतिशत है. जनवादी कोरिया अपनी जरूरत की अधिकांश चीजें घर पर ही पैदा करता है और जो घर पर नहीं पैदा किया जा सकता, उसे आयात किया जाता है. विदेशी व्यापार अपने आप में एक साध्य नहीं है, बल्कि एक साध्य को प्राप्त करने का एक साधन है.

 

जनवादी कोरिया स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है

 

'जनवादी कोरिया चीन के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता’  इस विषय के कई रूप हैं, जैसे कि यह धारणा कि जनवादी कोरिया 'सोवियत सहायता पर निर्भर था' और वह सोवियत संघ या चीन या दोनों की रचना है और यहां तक कि उन दोनों देशों की एक प्रति है. इस प्रकार की गलतफहमियां (कुछ मामलों में यह वास्तविक गलतफहमी है, अन्य मामलों में यह बड़े देशों की पूजा करने की गलत मान्यता पर आधारित है) जनवादी कोरिया की उपलब्धियों को कम आंकती हैं और नकारती हैं, इसके साथ एकजुटता को कमजोर करती हैं और प्रभावी रूप से जूछे विचार के प्रसार को अवरुद्ध करती हैं.

 

 

आइए इन तर्कों की विस्तार से जांच करें. सबसे पहले, जनवादी कोरिया और जूछे विचार दोनों ही  कॉमरेड किम इल संग के नेतृत्व में जापान-विरोधी सशस्त्र संघर्ष में मजबूती से निहित हैं.  कॉमरेड किम इल संग ने 1926 में डाउन-विथ-इम्पीरियलिज्म यूनियन (साम्राज्यवाद-विरोधी संघ) की स्थापना करते समय जापान-विरोधी स्वतंत्रता संघर्ष शुरू किया था, यह जुलाई 1930 में कोरियाई क्रांतिकारी सेना के गठन और बाद में अप्रैल 1932 में जापान-विरोधी पीपुल्स गुरिल्ला सेना के गठन के साथ सशस्त्र संघर्ष में बदल गया, जो 1934 में कोरियाई पीपुल्स रिवोल्यूशनरी आर्मी (कोरियाई जन क्रन्तिकारी सेना (KPRA)) बन गई.  कॉमरेड किम इल संग ने जून 1930 में कोरियाई क्रांतिकारी कैडरों की ऐतिहासिक कालुन बैठक में जूछे विचार की रूपरेखा प्रस्तुत की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि "अनुभव बताता है कि क्रांति को विजय की ओर ले जाने के लिए, किसी को जनता के बीच जाना चाहिए और उन्हें संगठित करना चाहिए, और क्रांति के दौरान उत्पन्न होने वाली सभी समस्याओं को दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय, वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप, स्वतंत्र रूप से अपनी जिम्मेदारी पर हल करना चाहिए.

 

इस सबक से सीख लेते हुए हम इस दृढ़ दृष्टिकोण को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं कि कोरियाई क्रांति के स्वामी कोरियाई लोग हैं और कोरियाई क्रांति को हर हाल में कोरियाई लोगों द्वारा ही अपने देश की वास्तविक परिस्थितियों के अनुकूल तरीके से क्रियान्वित किया जाना चाहिए."

 

उन्होंने यह भी बताया कि 'हम बिना किसी राज्य समर्थन और बाहरी सहायता के सशस्त्र संघर्ष लड़ते हैं.'

 

जापान-विरोधी गुरिल्लाओं ने 9 अगस्त 1945 को सोवियत संघ के जापान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने से पहले 15 लंबे वर्षों तक आत्मनिर्भरता की भावना से लड़ाई लड़ी. चीन स्वयं अभी भी प्रतिक्रियावादी केएमटी (कुओमिन्तांग) के शासन में था और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का अस्तित्व 1949 तक नहीं आया था.

 

इसलिए कोरिया की मुक्ति को केवल सोवियत सहायता का परिणाम मानना बहुत गलत है. वास्तव में, जापान-विरोधी गुरिल्लाओं ने बिना किसी राज्य या पिछले अड्डे के समर्थन के लड़ाई लड़ी. कोरियाई जन क्रन्तिकारी सेना (KPRA) ने आत्मनिर्भरता और जूछे विचार की क्रांतिकारी भावना से लड़ाई लड़ी. उन्होंने जापानी आक्रमणकारियों से हथियार छीने या स्वयं निर्मित किए. कुछ को उम्मीद थी कि पहला समाजवादी राज्य सोवियत संघ उन्हें हथगोला कारखाना उपलब्ध कराएगा, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने अपने स्वयं के हथगोले 'योंगिल बम' बनाए.

 

 कॉमरेड किम इल संग ने शुरू से ही समाजवादी खेमे (जो उन दिनों पूर्वी बर्लिन और प्राग से व्लादिवोस्तोक और शंघाई तक फैला हुआ था) के साथ भाईचारे के गठबंधन पर जोर देते हुए, सभी मामलों में स्वतंत्रता पर भी जोर दिया. 1947 में उन्होंने कहा था कि "पूर्ण राष्ट्रीय स्वतंत्रता और संप्रभुता तथा राष्ट्रीय समृद्धि और विकास के लिए, किसी को एक स्वतंत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का निर्माण करना चाहिए और इस प्रकार आर्थिक स्वतंत्रता को मजबूती से सुनिश्चित करना चाहिए."

 

 कॉमरेड किम इल संग ने एक स्वतंत्र हथियार उद्योग के निर्माण के महत्व पर भी जोर दिया.

 

यह सच है कि पितृभूमि मुक्ति युद्ध (कोरियाई युद्ध) के दौरान जनवादी कोरिया कल्पना से परे तबाह हो गया था और देश के पुनर्निर्माण के लिए उसे सोवियत संघ, चीन, रोमानिया आदि जैसे समाजवादी देशों से सहायता मिली थी. पश्चिमी और दक्षिण कोरियाई स्रोतों का कहना है कि 1960 में जनवादी कोरिया के बजट में राजस्व का 2.6% हिस्सा विदेशी सहायता था. यह  दक्षिण कोरिया को अमेरिका और अन्य देशों से प्राप्त राशि की तुलना में एक बहुत छोटा सा अंश है(दक्षिण कोरिया में यह 23% था) .यह भी संभावना है कि दक्षिण कोरिया ने जनवादी कोरिया को मिलने वाली सहायता की मात्रा को बढ़ा-चढ़ाकर बताया हो.  कॉमरेड किम इल संग ने अपने प्रसिद्ध भाषण "कोरियाई जनतांत्रिक जनवादी गणराज्य में समाजवादी निर्माण और दक्षिण कोरियाई क्रांति पर" में बताया था कि जनवादी कोरिया को समाजवादी देशों से लगभग 550 मिलियन डॉलर की सहायता मिली थी. हालाँकि उन्होंने कहा, 'लेकिन उन दिनों में भी, यह हमारा सिद्धांत था कि हम अपने लोगों की शक्तियों और अपने राष्ट्रीय संसाधनों का पूरा उपयोग करें; साथ ही हमने भ्रातृ देशों से सहायता का प्रभावी उपयोग करने का भी प्रयास किया. वास्तव में, युद्धोत्तर पुनर्निर्माण में निर्णायक भूमिका हमारी अपनी शक्तियों ने निभाई थी. बाद के वर्षों में हमारे देश के आर्थिक निर्माण में प्राप्त उपलब्धियों का उल्लेख करने की कोई आवश्यकता नहीं है.'

 

जो लोग जनवादी कोरिया को सोवियत और चीनी सहायता के बारे में बकवास करते हैं, वे मुद्दे को भूल जाते हैं; निर्णायक कारक बाहरी लोग नहीं बल्कि स्वयं कोरियाई लोगों के प्रयास हैं.

 

जनवादी कोरिया का उदार दाता होने के बजाय, सोवियत संघ ने वास्तव में 1962 में जनवादी कोरिया पर अपने प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए थे, जब जनवादी कोरिया ने ख्रुश्चेव संशोधनवादियों की संशोधनवादी लाइन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. कुछ स्रोतों का यह भी कहना है कि 1975 में सोवियत संघ ने जनवादी कोरिया को तेल की कीमत में भारी वृद्धि कर दी थी.

 

जहाँ तक इस विचार का सवाल है कि जनवादी कोरिया चीन के बिना जीवित नहीं रह सकता, जबकि यह सच है कि ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के बीच घनिष्ठ संबंध रहे हैं, लेकिन जनवादी कोरिया साथ ही स्वतंत्र भी है, वह अपना स्वामी स्वयं है और किसी की कठपुतली नहीं है.

 

वास्तव में 1992 में चीन ने जनवादी कोरिया से विदेशी व्यापार खातों का निपटान डॉलर में करने को कहा था. चीन ने जनवादी कोरिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी प्रतिबंधों के पक्ष में मतदान किया. कुछ लोग कहते हैं कि चीन गुप्त रूप से जनवादी कोरिया के खिलाफ प्रतिबंधों को तोड़ता है, लेकिन क्या यह अमेरिका और अन्य जगहों पर चीन से नफरत करने वाले अति-नवरूढ़िवादियों का रुख नहीं है? निश्चित रूप से चीन केवल जानबूझकर उन्हें तोड़ने के लिए प्रतिबंधों के पक्ष में मतदान नहीं करेगा.

 

जनवादी कोरिया की स्वतंत्र राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था कलाई घड़ी से लेकर परमाणु मिसाइल तक लगभग कोई भी उत्पाद तैयार कर सकती है. 1970 के दशक में जनवादी कोरिया अपनी 98% मशीनरी और 75% ईंधन और औद्योगिक सामग्री का उत्पादन करने में सक्षम था. जबकि यह सच हो सकता है कि जनवादी कोरिया के विदेशी व्यापार का एक बड़ा हिस्सा चीन के साथ है, इस बात पर जोर देने की आवश्यकता है कि जनवादी कोरिया में विदेशी व्यापार आर्थिक उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा नहीं है. जनवादी कोरिया में विदेशी व्यापार सकल राष्ट्रीय उत्पाद का एक छोटा प्रतिशत है, दक्षिण कोरियाई कठपुतली शासन के विपरीत, जिसका 88% सकल राष्ट्रीय उत्पाद विदेशी व्यापार से आता है और इसलिए वह अत्यधिक निर्भर है. इस प्रकार जनवादी कोरिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक बड़ा हिस्सा प्रतिबंधों से अप्रभावित रहेगा. 1 बिलियन डॉलर पश्चिमी अनुमान के अनुसार जनवादी कोरिया के जीडीपी का केवल लगभग 3.5 प्रतिशत है, लेकिन चूंकि जनवादी कोरिया की वास्तविक जीडीपी वास्तव में अधिक है, यह एक बहुत कम आंकड़ा है.

 

जनवादी कोरिया की अर्थव्यवस्था 1990 के दशक से अधिक आत्मनिर्भर हो गई है.  1990 के दशक में जनवादी कोरिया में मिलने वाले कई सामान चीन में निर्मित होते थे, लेकिन आजकल जनवादी कोरिया में दुकानें घरेलू स्रोत वाले उत्पादों से भरी हुई हैं. इसके अलावा जनवादी कोरिया ने  कोरोना काल में अपनी सीमा बंद कर दी और इस दौरान बिना किसी समस्या के जीवित रहा. यह एकमात्र तथ्य 'जनवादी कोरिया चीन के बिना जीवित नहीं रह सकता' के तर्क को चकनाचूर कर देता है.

 

जूछे और आत्मनिर्भरता पर आधारित जनवादी कोरिया अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है.

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