अगर यूक्रेन जनवादी कोरिया पर हमला करे तो क्या होगा?

 


अमेरिका के कोरियाई प्रायद्वीप पर युद्ध संबंधी परिदृश्यों में अक्सर ‘छद्म युद्ध (Proxy War)’ दिखाई देता है. अर्थात अमेरिका स्वयं सीधे युद्ध में शामिल न होकर दक्षिण कोरिया या जापान को आगे करके जनवादी कोरिया के साथ युद्ध करता है. इसे कुछ हद तक यूक्रेन को आगे करके रूस के साथ युद्ध करने जैसा माना जा सकता है.

लेकिन हाल ही में एक नया छद्म युद्ध परिदृश्य(Scenario) सामने आया. यह एक विचित्र परिदृश्य है जिसमें यूक्रेन को आगे करके जनवादी कोरिया के साथ युद्ध करने की बात कही गई है. इस परिदृश्य की बात  जनवादी कोरिया में ब्रिटेन के पूर्व राजदूत जॉन एवरार्ड द्वारा की गई.

एवरार्ड ने 25 जुलाई को यूक्रेन द्वारा कैस्पियन सागर में एक ईरानी मालवाहक जहाज पर ड्रोन से किए गए हमले से प्रेरणा लेते हुए सुझाव दिया कि यूक्रेन रूस के प्रमुख सहयोगी जनवादी कोरिया के जहाजों पर भी हमला क्यों न करे. उसका तर्क है कि चूँकि जनवादी कोरिया रूस की मदद कर रहा है, इसलिए इसके लिए पर्याप्त औचित्य है और चूँकि जनवादी कोरिया तथा यूक्रेन एक-दूसरे से बहुत दूर हैं, इसलिए इसके पूर्ण युद्ध में बदलने की संभावना कम है और जोखिम भी कम होगा. उसने यह भी कहा कि यदि यह सफल रहा तो डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति पर गहरी छाप छोड़ी जा सकती है.

उसने विशेष रूप से ऐसे तरीकों का सुझाव दिया जैसे जनवादी कोरिया के सैन्य सामान को ले जाने वाला जहाज जब रूसी क्षेत्रीय जल में हो तब उस पर ड्रोन से हमला करना, या 3,000 किलोमीटर से अधिक मारक क्षमता वाले नवीनतम ड्रोन को जहाज पर लादकर प्रशांत महासागर तक ले जाना और वहाँ से उसे प्रक्षेपित करना. उसने यह भी कहा कि जनवादी कोरिया की ड्रोन-रोधी रक्षा प्रणाली कमजोर है, इसलिए जनवादी कोरियाई नेतृत्व को धमकाया जा सकता है और अंततः जनवादी कोरिया युद्ध को बढ़ने से रोकने के लिए कोई कूटनीतिक औचित्य तलाशेगा. उसने अनुमान लगाया कि जनवादी कोरिया में राजनीतिक अव्यवस्था पैदा हो सकती है, वह रक्षात्मक स्थिति में आ सकता है और यूक्रेन युद्ध में सैनिक न भेजने पर सहमत हो सकता है.

अर्थात एवरार्ड का प्रस्ताव यह है कि यदि जनवादी कोरिया अतिरिक्त सैनिक भेजता है तो इससे यूक्रेन के लिए खतरा पैदा होगा, इसलिए यूक्रेन पहले जनवादी कोरिया पर हमला करे और फिर जनवादी कोरिया के साथ यह समझौता करे कि ‘यदि आप सैनिक भेजना रद्द कर दें तो हम हमला रोक देंगे.’ एवरार्ड को ब्रिटिश कूटनीतिक विशेषज्ञ मानते हुए, शायद यह वही बात हो सकती है जो अमेरिका या ब्रिटेन यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की से चाहता है.

पर जनवादी कोरिया की प्रतिक्रिया ईरान से अलग होगी

अगर यूक्रेन जनवादी कोरिया पर हमला करता है तो जनवादी कोरिया कैसे प्रतिक्रिया देगा?

जब यूक्रेन ने ईरानी जहाज पर हमला किया और एक ईरानी नाविक की मौत हुई, तब ईरान केवल राजनयिक विरोध तक सीमित रहा और यह कहते हुए स्थिति को शांत कर दिया कि यूक्रेनी पक्ष ने तनाव बढ़ाने की कोशिश नहीं करने की बात कही है. ईरान के पास यूक्रेन तक पहुँचने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, इसलिए यदि वह चाहता तो पर्याप्त रूप से हमला कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. विशेषज्ञों का मानना था कि ईरान के लिए यूक्रेन पर हमला करने में अनेक कूटनीतिक और सैन्य समस्याएँ थीं, इसलिए अंततः उसने हमला न करने का निर्णय लिया होगा.

इसे देखकर अमेरिका यह मान सकता है कि जनवादी कोरिया भी ईरान की तरह केवल निष्क्रिय प्रतिक्रिया तक सीमित रहेगा. जनवादी कोरिया में राजदूत रह चुके और संभवतः अन्य पश्चिमी लोगों की तुलना में जनवादी कोरिया के बारे में अधिक जानकारी रखने वाले एवरार्ड ने भी अनुमान लगाया कि जनवादी कोरिया युद्ध को बढ़ने से रोकने के लिए समझौता करेगा, इसलिए यह काफी विश्वसनीय लग सकता है.

लेकिन जनवादी कोरिया ईरान से अलग है और सक्रिय प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करेगा. मूलतः ईरान भी अमेरिका के विरुद्ध ‘आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत’ के स्तर की प्रतिक्रिया देता रहा है, लेकिन जनवादी कोरिया में ‘एक हजार गुना प्रतिशोध(천백배 복수)’ मूल सिद्धांत रहा है.

और भले ही यूक्रेन ने जनवादी कोरिया पर हमला किया हो, वह अमेरिका द्वारा हमला किए जाने से अलग नहीं है. यूक्रेन हमले के लक्ष्यों की पहचान के लिए अमेरिकी उपग्रह खुफिया जानकारी पर पूरी तरह निर्भर है. संभवतः इस बार भी जब उसने ईरानी जहाज पर हमला किया, अमेरिका ने जानकारी उपलब्ध कराई होगी.

इसलिए जनवादी कोरिया अमेरिका की ‘शरारत’ को सबक सिखाने के दृष्टिकोण से भी यूक्रेन को निश्चित रूप से जवाब देगा.

लेकिन यदि जनवादी कोरिया को यूक्रेन पर सैन्य हमला करना हो तो उसके पास अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं होगा. रूस के रास्ते यूक्रेन पर हमला करने का तरीका भी सोचा जा सकता है, लेकिन यह यूक्रेन पर रूस द्वारा प्रतिदिन दागी जाने वाली दर्जनों या सैकड़ों मिसाइलों में कुछ और मिसाइलें जोड़ने जैसा ही होगा, इसलिए यूक्रेन के हमले के प्रतिशोध का स्वरूप स्पष्ट रूप से सामने नहीं आएगा.

यदि जनवादी कोरिया अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपित करता है तो स्वाभाविक रूप से उसमें परमाणु वारहेड लगाया जाएगा. दुनिया में पारंपरिक वारहेड से लैस अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल नहीं हैं. क्योंकि अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें कितनी भी परिष्कृत क्यों न बनाई जाएँ, उनकी सटीकता केवल कुछ सौ मीटर के स्तर की होती है, इसलिए किसी विशिष्ट लक्ष्य पर सटीक प्रहार करना असंभव है. इसलिए उनमें ऐसे परमाणु वारहेड लगाए जाते हैं जो पूरे लक्ष्य क्षेत्र को तबाह कर दें. यही कारण है कि परमाणु हथियार न रखने वाले देश अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल विकसित नहीं करते.

अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल के वारहेड में सामरिक परमाणु हथियार नहीं बल्कि रणनीतिक परमाणु हथियार होता है. इसलिए इसकी शक्ति एक पूरे शहर को नष्ट कर देने जैसी होगी. यदि ह्वासोंग-19 या 20 जैसे बहु-वारहेड वाली मिसाइल दागी जाएँ तो यूक्रेन के कई शहर एक साथ गायब हो सकते हैं. विशेषज्ञों का अनुमान है कि जनवादी कोरिया के रणनीतिक परमाणु वारहेड की विस्फोटक शक्ति हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम की लगभग पाँच गुना है.

दुनिया की प्रतिक्रिया कैसी होगी?

जनवादी कोरिया के परमाणु हमले से यूक्रेन तबाह हो जाएगा और जनवादी कोरिया के सामने आत्मसमर्पण कर देगा. चूँकि यूक्रेन युद्ध जारी रखने में भी सक्षम नहीं होगा, इसलिए वह रूस के सामने भी आत्मसमर्पण कर देगा. चार साल से अधिक समय से चल रहा युद्ध एक मिसाइल से समाप्त हो जाएगा.

महत्वपूर्ण बात अमेरिका की प्रतिक्रिया है. वास्तव में अमेरिका ने यूक्रेन को उकसाया और उसकी मदद की, जिससे यूक्रेन ने जनवादी कोरिया पर हमला किया, लेकिन अमेरिका यूक्रेन की ओर से प्रतिशोध नहीं लेगा. वह केवल कूटनीतिक रूप से निंदा के बयान जारी करेगा और बात वहीं समाप्त हो जाएगी.

अमेरिका हमेशा इस बात को लेकर चिंतित रहा है कि यदि वह जनवादी कोरिया पर हमला करता है तो क्या जनवादी कोरिया अमेरिकी मुख्यभूमि पर परमाणु मिसाइल दागेगा. लेकिन यूक्रेन के साथ जो होगा उसे देखकर उसे विश्वास हो जाएगा. अमेरिका यूक्रेन के माध्यम से यह पुष्टि कर लेगा कि जनवादी कोरिया के पास अमेरिकी मुख्यभूमि पर परमाणु मिसाइल दागने की क्षमता भी पर्याप्त है और इच्छा भी.

चीन और रूस जनवादी कोरिया के और अधिक निकट आने का प्रयास करेंगे.

उन्हें स्पष्ट रूप से पता होगा कि यूक्रेन द्वारा जनवादी कोरिया पर हमला वास्तव में अमेरिका का कृत्य था, और चूँकि जनवादी कोरिया ने उसका परमाणु हमले से प्रतिशोध लिया, इसलिए यह लगभग अमेरिका पर परमाणु प्रहार करने के समान होगा. अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों से ग्रस्त चीन और रूस की जनता खुशी मनाते हुए जनवादी कोरिया की प्रशंसा करेगी. विशेष रूप से रूसी जनता जनवादी कोरिया की वजह से चार वर्ष से अधिक समय से चल रहे युद्ध के समाप्त होने और यूक्रेन के नष्ट होने से अधिक प्रसन्न होगी, जो इतने लंबे समय से रूसी नागरिकों पर ड्रोन से आतंकवादी हमले कर रहा था. इस जनमत को देखते हुए चीन और रूस की सरकारें भी जनवादी कोरिया के साथ संबंधों को और मजबूत करने के लिए जनवादी कोरिया-समर्थक नीतियाँ अपनाएँगी.

मध्य पूर्व, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका आदि क्षेत्रों में भी इसका बड़ा प्रभाव दिखाई देगा.

ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जो लंबे समय से अमेरिका के कारण पीड़ित रहे हैं. लेकिन अमेरिका के समर्थन वाले यूक्रेन पर साहसपूर्वक परमाणु मिसाइल दागना एक अत्यंत बड़ी घटना होगी. संभवतः जनवादी कोरिया की प्रशंसा करते हुए सैन्य सहायता की माँग करने वाला जनमत विस्फोटक रूप से उभरेगा. संभवतः मध्य पूर्व में भी इज़राइल पर परमाणु मिसाइल दागने की माँग करने वाली आवाजें उठेंगी. इज़राइल जनवादी कोरिया से भयभीत होकर पूरी तरह झुक जाएगा.

वास्तव में नवंबर 2023 में गाजा पट्टी पर इज़राइल के हमले के विरोध में फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों द्वारा कॉमरेड किम जंग उन की तस्वीरें उठाए जाने का दृश्य मीडिया में सामने आया था और उसने ध्यान आकर्षित किया था. उस समय लेबनान में हमास के वरिष्ठ अधिकारी अली बराके ने 2 नवंबर 2023 को एक मीडिया साक्षात्कार में कहा था, “वह दिन आ सकता है जब जनवादी कोरिया (फिलिस्तीन-इज़राइल युद्ध में) हस्तक्षेप करेगा. क्योंकि अंततः वह (हमारे) गठबंधन का एक हिस्सा है,” और अपनी अपेक्षा व्यक्त की थी.


जुलाई 2023 में पश्चिमी प्रभुत्व का विरोध करते हुए विद्रोह करने वाले अफ्रीकी देश नाइजर के प्रदर्शनकारियों द्वारा जनवादी कोरिया का झंडा उठाए जाने का दृश्य भी ध्यान आकर्षित कर चुका है. अफ्रीकी लोग भी जनवादी कोरिया को पश्चिम-विरोधी प्रमुख देश के रूप में देखते हैं और उम्मीद करते हैं कि वह उनकी मदद कर सकता है.



यदि यूक्रेन पर जनवादी कोरिया की परमाणु मिसाइल गिरती है तो जनवादी कोरिया के दक्षिण में स्थित अमेरिकी नव उपनिवेश दक्षिण कोरिया के लोग क्या सोचेंगे?

सबसे पहले, वे जनवादी कोरिया की शक्तिशाली सैन्य क्षमता और कठोर प्रतिशोध की इच्छा को देखकर बहुत बड़ा झटका महसूस करेंगे. परमाणु हथियारों की शक्ति के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन उसे वास्तविक रूप में देखना बिल्कुल अलग बात है. इसके अलावा वे लोग भी चुप हो जाएँगे जो यह कहकर जनवादी कोरिया को कमतर आँकते रहे हैं कि उसकी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों की वास्तविक युद्ध क्षमता प्रमाणित नहीं हुई है या वायुमंडल में पुनः प्रवेश करने की क्षमता की पुष्टि नहीं हुई है.

इसके अलावा अमेरिका को केवल मौखिक रूप से निंदा करते और अंततः कोई कार्रवाई करने में असमर्थ देखते हुए भी उन्हें झटका लगेगा. दक्षिण कोरियाई लोगों के बीच अमेरिका समर्थक और जनवादी कोरिया-विरोधी यह भावना व्यापक रूप से फैली हुई है कि जनवादी कोरिया चाहे जितनी परमाणु धमकी दे, अंततः यदि अमेरिका परमाणु मिसाइल दाग देगा तो जनवादी कोरिया समाप्त हो जाएगा. लेकिन वास्तविकता देखने पर पता चलेगा कि जनवादी कोरिया द्वारा परमाणु हमला किए जाने के बावजूद अमेरिका जवाब नहीं दे पाया. इसे देखकर अमेरिका समर्थक और जनवादी कोरिया-विरोधी भावना तेजी से ढह जाएगी.

लोग शक्तिशाली अस्तित्व से भय महसूस करते हैं या उसके प्रति आकर्षण रखते हैं.

अमेरिकी प्रभुत्व के कमजोर होने के साथ अमेरिका को दुनिया का सर्वोच्च देश मानकर उसकी पूजा करने वाली ‘अमेरिका-पूजक भावना’ काफी फीकी पड़ी है. साथ ही दुनिया के विभिन्न देशों पर आक्रमण करने और टैरिफ बमों आदि से विश्व अर्थव्यवस्था को अस्त-व्यस्त करने वाले अमेरिका को एक बदमाश देश मानने की धारणा व्यापक रूप से फैल रही है. लेकिन यह पराजयवादी भावना भी कम नहीं है कि अमेरिका महाशक्ति है, इसलिए हम कुछ नहीं कर सकते. ऐसी स्थिति में जब लोग अमेरिका को सबक सिखाने वाले जनवादी कोरिया को देखेंगे तो उनके भीतर उसके प्रति आकर्षण पैदा होगा.

पूर्वी एशिया में युद्ध रुक जाएगा

अमेरिका पहले से ही पूर्वी एशिया में युद्ध शुरू करने की तैयारी करता रहा है. उसका उद्देश्य कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान में युद्ध शुरू करके अपने कमजोर हो चुके प्रभुत्व को फिर से स्थापित करना है. विशेष रूप से ईरान युद्ध में हार के बाद वह अगले युद्धक्षेत्र के रूप में पूर्वी एशिया पर ध्यान दे रहा है.

अमेरिका की पूर्वी एशिया युद्ध योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देश जापान और दक्षिण कोरिया  हैं. दूसरे शब्दों में, जिस तरह अमेरिका यूक्रेन को आगे करके रूस के साथ प्रॉक्सी युद्ध करना चाहता है, उसी तरह वह जापान और दक्षिण कोरिया  को आगे करके जनवादी कोरिया तथा चीन के साथ प्रॉक्सी युद्ध करना चाहता है.

इसी के अनुरूप जापान के सैन्यवाद की ओर बढ़ने की गतिविधियाँ गंभीर हैं. अक्टूबर 2025 में ताकाइची सानाए सरकार के सत्ता में आने के बाद यह विशेष रूप से तेज हुई हैं, लेकिन जापान का सैन्यीकरण केवल पिछले एक-दो वर्षों की बात नहीं है.

सबसे पहले, जापान युद्ध और सेना रखने पर प्रतिबंध लगाने वाले शांतिवादी संविधान में संशोधन करने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा है. कहा जाता है कि 2012 में शिंजो आबे के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर संविधान संशोधन समर्थक ताकतें मुख्यधारा बन गईं. 2014 में संविधान की पुनर्व्याख्या करने वाले ‘व्याख्यात्मक संवैधानिक संशोधन’ के माध्यम से ‘सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग’ की अनुमति देकर दूसरे देशों में सैनिक भेजने का आधार तैयार किया गया और 2022 में सुरक्षा संबंधी तीन दस्तावेजों से जुड़े कानून में संशोधन कर ‘शत्रु ठिकानों पर हमला करने की क्षमता’ की अनुमति दी गई. इसके बाद अक्टूबर 2025 में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी और निप्पॉन इशिन पार्टी के बीच गठबंधन सरकार बनाते समय संविधान संशोधन पर सहमति बनी और 8 फरवरी 2026 को प्रतिनिधि सभा के चुनाव में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने अकेले ही संविधान संशोधन प्रस्ताव पेश करने के लिए आवश्यक संख्या पार कर ली, जिससे संविधान संशोधन की संभावना और बढ़ गई.

इसके अलावा संविधान संशोधन से अलग भी घातक हथियारों के निर्यात की अनुमति, सुरक्षा संबंधी तीन दस्तावेजों में संशोधन, मार्शल लॉ कानून की स्थापना, तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों में संशोधन आदि के माध्यम से व्यवहारतः संविधान संशोधन के समान प्रभाव पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है.

रक्षा बजट को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 1% के भीतर सीमित रखने के सिद्धांत को भी तोड़ते हुए 2023 से यह हर वर्ष 1.4%, 1.6%, 1.8%, 1.9% तक लगातार बढ़ रहा है.

युद्ध के कमांड ढाँचे के निर्माण पर भी जोर देते हुए थल, समुद्री और वायु आत्मरक्षा बलों को व्यवस्थित रूप से कमांड करने के लिए संयुक्त संचालन कमान स्थापित की गई है. इसके अनुरूप अमेरिका ने भी जापान स्थित अमेरिकी सेना की कमान का पुनर्गठन करके जापान स्थित अमेरिकी सेना की संयुक्त सैन्य कमान (JFHQ) शुरू करने का निर्णय लिया है और जापान में तैनात अमेरिकी सेना तथा आत्मरक्षा बलों के बीच समन्वय के लिए ‘आत्मरक्षा बल संयुक्त संचालन कमान सहयोग टीम (JCT)’ स्थापित करने के बाद संयुक्त संचालन के समन्वय के लिए ‘संयुक्त संचालन समन्वय केंद्र (BOCC)’ की स्थापना पर चर्चा कर रहा है.

इसके अलावा एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स को एयर एंड स्पेस सेल्फ-डिफेंस फोर्स के रूप में विस्तारित और पुनर्गठित करना तथा प्रधानमंत्री के सीधे अधीन राष्ट्रीय खुफिया ब्यूरो स्थापित करना आदि के माध्यम से युद्ध की तैयारी पूरी तरह से की जा रही है.

जापान विशेष रूप से खुले तौर पर ताइवान युद्ध की तैयारी कर रहा है. प्रधानमंत्री ताकाइची ने कहा है कि ताइवान में आपात स्थिति होने पर आत्मरक्षा बलों को भेजा जा सकता है और ताइवान से केवल 110 किलोमीटर दूर स्थित योनागुनी द्वीप सहित कई द्वीपों पर आत्मरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने और मिसाइलें तैनात करने आदि के माध्यम से सैन्य अड्डों में बदलने का काम किया जा रहा है.

इसके अलावा जनवादी कोरिया और चीन पर हमला करने के लिए 1,000 किलोमीटर तक मारक क्षमता बढ़ाई गई ‘टाइप-25 सतह-से-समुद्र निर्देशित मिसाइल’ विकसित करके तैनात की गई है और ‘टाइप-25 हाइपरसोनिक ग्लाइड प्रोजेक्टाइल’ भी विकसित तथा तैनात की गई है, जिसके बारे में बताया जाता है कि वह कई सौ किलोमीटर तक सुपरसोनिक गति से कम ऊँचाई पर उड़ सकती है. इसके साथ ही अधिकतम 1,600 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली अमेरिकी क्रूज मिसाइल टॉमहॉक भी आयात करके वास्तविक संचालन में तैनात की जा रही है. इसके अलावा इज़ुमो श्रेणी के दो हेलीकॉप्टर कैरियरों को F-35B स्टेल्थ लड़ाकू विमानों के संचालन में सक्षम बनाने के लिए संशोधित करके वास्तव में विमानवाहक पोत में बदल दिया गया है.

जापान दूसरे देशों को भी युद्ध की तैयारी में शामिल करने के लिए जोर-शोर से प्रयास कर रहा है.

सबसे पहले, नाटो को पूर्वी एशिया में लाने का मुख्य जिम्मेदार जापान है. 2023 और 2024 में इटली ने F-35A और F-35B तैनात करके जापान के साथ संयुक्त अभ्यास किया और 2025 में ब्रिटेन ने F-35B भेजकर जापान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किया. इस वर्ष उसने नीदरलैंड को भी शामिल करके अमेरिका के साथ पूर्वी सागर में संयुक्त हवाई अभ्यास किया. नाटो यूरोप से आगे बढ़कर पूरी दुनिया में प्रभाव डालना चाहता है और जापान उसके लिए पुल का काम कर रहा है.

इसके अलावा अन्य देशों की सेनाओं के जापान आने पर प्रवेश और उपकरण लाने की प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए पारस्परिक पहुँच समझौते (RAA) को आगे बढ़ाया जा रहा है. 2022 में ऑस्ट्रेलिया, 2023 में ब्रिटेन और 2024 में फिलीपींस के साथ क्रमशः समझौते किए गए तथा फ्रांस के साथ भी चर्चा चल रही है.

पूर्वी एशिया में युद्ध की तैयारी में सबसे महत्वपूर्ण बात निस्संदेह अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  सैन्य सहयोग प्रणाली को मजबूत करना है.

अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  सैन्य सहयोग प्रणाली को मजबूत करने में दक्षिण कोरिया की कठपुतली ली जे-म्यंग सरकार भी सक्रिय रूप से आगे बढ़ रही है. 23 अगस्त 2025 को जापान में आयोजित जापान- दक्षिण कोरिया  शिखर सम्मेलन की संयुक्त घोषणा में दोनों देशों के नेताओं ने “तेजी से बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच अडिग जापान- दक्षिण कोरिया  तथा अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  सहयोग को आगे बढ़ाने” और “जापान- दक्षिण कोरिया  संबंधों के विकास से अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  सहयोग को मजबूत करने वाला सकारात्मक चक्र जारी रखने” पर सहमति व्यक्त की. इस वर्ष 7 मई को जापान- दक्षिण कोरिया  विदेश एवं रक्षा 2+2 सुरक्षा वार्ता को पहले के महानिदेशक स्तर से उपमंत्री स्तर तक बढ़ाकर आयोजित किया गया और इस बैठक में जापान- दक्षिण कोरिया  के बीच सैन्य रसद सहयोग तथा संयुक्त सैन्य अभ्यासों के विस्तार पर चर्चा हुई.

इसके अलावा पिछले जनवरी में दक्षिण कोरियाई विशेष उड़ान दल ‘ब्लैक ईगल्स’ को जापान एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स से ईंधन भरने की सहायता मिलने के अवसर पर जापान और दक्षिण कोरिया  के बीच सैन्य विमानों के लिए ईंधन सहायता को नियमित करने पर चर्चा चल रही है. कई लोग अनुमान लगा रहे हैं कि यह मुद्दा जापान- दक्षिण कोरिया  पारस्परिक सैन्य रसद सहायता समझौते (ACSA) की चर्चा तक पहुँच सकता है.

अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  के त्रिपक्षीय संयुक्त सैन्य अभ्यास भी ध्यान देने योग्य हैं.

पिछले वर्ष 18 जून को आयोजित अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  संयुक्त हवाई अभ्यास और 11 जुलाई को आयोजित अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  संयुक्त हवाई अभ्यास के बाद 15 से 19 सितंबर तक अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  के बीच सबसे बड़े बहु-क्षेत्रीय संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘फ्रीडम एज 25’ का आयोजन किया गया. इस वर्ष 7 जून को जेजू द्वीप के दक्षिण-पूर्वी समुद्री क्षेत्र में जापान- दक्षिण कोरिया  खोज एवं बचाव अभ्यास (SAREX) को नौ वर्ष बाद फिर से शुरू किया गया. पिछले 15 जुलाई को अमेरिका-जापान- दक्षिण कोरिया  के तीनों देशों के ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष अमेरिका में मिले और बैठक आयोजित की. संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से इस वर्ष भी ‘फ्रीडम एज’ संयुक्त अभ्यास आयोजित करने पर सहमति बनी.

24 जून से 31 जुलाई तक आयोजित दुनिया के सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय समुद्री अभ्यास ‘रिमपैक 2026’ में दक्षिण कोरियाई नौसेना, जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स और जापान ग्राउंड सेल्फ-डिफेंस फोर्स की भागीदारी भी ध्यान देने योग्य है. उस समय पहली बार दक्षिण कोरिया ने संयुक्त नौसेना घटक कमांडर का पद संभाला और जापान ने उप-कमांडर का पद संभाला. इसे पूर्वी एशिया युद्ध में अमेरिका के पीछे हटने और दक्षिण कोरिया तथा जापान के आगे आकर प्रॉक्सी युद्ध करने की अमेरिकी योजना का अंतिम अभ्यास कहा जा सकता है और इससे कहा जा सकता है कि युद्ध उतना ही निकट आ गया है.

रिमपैक अभ्यास के दौरान कमांडर और उप-कमांडर की भूमिका निभाने वाली दक्षिण कोरियाई और जापानी नौसेनाओं के बीच निकटता तेजी से बढ़ी. युद्ध अपराधों से जुड़े ध्वज (उगते सूरज वाला झंडा) को सामने प्रदर्शित करने वाली जापानी समुद्री आत्मरक्षा बल और दक्षिण कोरियाई नौसेना को मैत्रीपूर्ण ढंग से साथ मिलते देखकर अमेरिका यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि आगामी युद्ध में जापान- दक्षिण कोरिया  संयुक्त सेना बनाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है.

रूस यूक्रेन युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं कर रहा है. वह उन अमेरिकी और यूरोपीय देशों पर भी सीधे हमला नहीं करता जो खुले तौर पर और प्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन का समर्थन कर रहे हैं. ईरान भी जितना हमला झेलता है उतना ही जवाब देता है, लेकिन युद्ध के विस्तार से बच रहा है. इन परिस्थितियों को देखकर अमेरिका यह मान सकता है कि यदि पूर्वी एशिया में युद्ध हुआ तो जनवादी कोरिया और चीन अमेरिकी मुख्यभूमि पर सीधे हमला नहीं करेंगे. 2017 में जब राष्ट्रपति ट्रंप ने जनवादी कोरिया पर हमला करने की बात कही थी और कहा था, “अगर युद्ध होता भी है तो वह वहीं होगा. हजारों लोग मारे जाएँगे तो वहीं मरेंगे, यहाँ नहीं,” अमेरिका अभी भी इसी सोच को मानता है. तब अमेरिका के पास पूर्वी एशिया में युद्ध न करने का कोई कारण नहीं रहेगा.

लेकिन यदि जनवादी कोरिया यूक्रेन पर परमाणु मिसाइल दागकर उसे खंडहर में बदल देता है तो स्थिति बदल जाएगी. अमेरिका को डर होगा कि जनवादी कोरिया को छेड़ने पर अमेरिकी मुख्यभूमि पर परमाणु मिसाइलें आ सकती हैं और बड़े शहर तबाह हो सकते हैं, और ऐसी स्थिति में उसे युद्ध छोड़ना ही पड़ेगा.

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव

जब अमेरिका के हमले का सामना कर रहे ईरान ने मध्य पूर्व क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डों को तबाह कर दिया, तो ईरान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत हुई. उसी तरह यदि यूक्रेन जनवादी कोरिया पर हमला करता है और उसके बाद परमाणु मिसाइल से तबाह हो जाता है, तो जनवादी कोरिया की अंतरराष्ट्रीय स्थिति ईरान की तुलना में भी कहीं अधिक तेजी से मजबूत होगी. अब कोई भी ‘जनवादी कोरिया का परमाणु निरस्त्रीकरण’ की बात नहीं कर सकेगा और जनवादी कोरिया परमाणु-संपन्न देश तथा परमाणु शक्ति के रूप में अपनी स्थिति को दृढ़ता से स्थापित कर लेगा. कोई भी देश जनवादी कोरिया के साथ मनमानी नहीं कर सकेगा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में जनवादी कोरिया का प्रभाव अत्यंत शक्तिशाली होकर ‘नंबर वन’ की स्थिति तक पहुँच जाएगा.

दूसरी ओर, यूक्रेन को तबाह होने से न रोक पाने और जनवादी कोरिया को दंडित न कर पाने वाला अमेरिका पूरी तरह तीसरे दर्जे के देश में बदल जाएगा. यहाँ तक कि अमेरिका के सहयोगी देश भी यह निश्चित रूप से समझ जाएँगे कि अमेरिका उनकी रक्षा नहीं कर सकता और उससे मुँह मोड़ लेंगे. वास्तव में जब ईरान ने मध्य पूर्व में कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया था, तभी से ऐसी भावना फैलने लगी थी, और जनवादी कोरिया इस पर अंतिम मुहर लगा देगा.

जनवादी कोरिया और अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय स्थिति में परिवर्तन को प्रतिबिंबित करते हुए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का भी पुनर्गठन होगा. जनवादी कोरिया की भागीदारी वाला प्रमुख देशों का एक नया परामर्श तंत्र बनाया जा सकता है. अब अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर चर्चा करते समय जनवादी कोरिया को बाहर रखना संभव नहीं होगा. जनवादी कोरिया संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य भी बन सकता है. चीन भी परमाणु शक्ति बनने के बाद 1971 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना था.

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में होने वाले बदलावों पर हमें सावधानीपूर्वक नजर रखनी चाहिए.


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