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परजीवी अर्थव्यवस्था

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दक्षिण कोरिया का नाम आते ही उसके तथाकथित “आर्थिक चमत्कार” की चर्चा जरुर की जाती है पर सच्चाई यह है कि तथाकथित "दक्षिण कोरियाई आर्थिक चमत्कार" वास्तव में कोई चमत्कार नहीं था , बल्कि यह केवल अमेरिकी साम्राज्यवाद ही नहीं , बल्कि ब्रिटेन जैसे अन्य साम्राज्यवादी देशों द्वारा दिए गए भारी आर्थिक सहायता और निवेश का परिणाम था. मूलतः दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था 1950 के दशक में अमेरिकी सहायता से प्रारंभ हुई. 1960 और 1970 के दशक में विदेशी ऋणों के माध्यम से उसका विस्तार हुआ. 1980 और 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के साथ उसका आकार तो बढ़ा , लेकिन उसी समय वह संरचनात्मक रूप से अमेरिका की उप-ठेका ( Subcontracting) अर्थव्यवस्था बनती चली गई. विशेष रूप से 1997 के IMF विदेशी मुद्रा संकट के बाद तेज़ी से लागू हुई नवउदारवादी वैश्वीकरण ( Neoliberal Globalization) के कारण दक्षिण कोरिया की पहले से ही परजीवी रह चुकी अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह अमेरिका के अधीन चली गई. अमेरिकी उपनिवेश दक्षिण कोरिया के प्रमुख बैंकों में विदेशी स्वामित्व सामान्यतः 60 प्रतिशत से अधिक है. यहाँ तक कि उसके सबसे...

एक नई दुनिया की भोर: बहुध्रुवीयता तथा जनवादी कोरिया–चीन–रूस

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  2008 की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंदी के बाद विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में तीव्र परिवर्तन आया. जिस व्यवस्था को बनाए रखने वाले अनेक नियम थे , उन्हीं नियमों का नेतृत्व करने वाली शक्तियों द्वारा उन्हें स्वयं क्षति पहुँचाई जा रही है और नष्ट किया जा रहा है. अनेक लोग यह कहते हुए अफसोस प्रकट करते हैं कि " अतीत की दुनिया हमेशा के लिए समाप्त हो चुकी है." आज पूरी दुनिया युद्धों और संघर्षों से घिरी हुई है. रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष जारी है , इज़राइल और फ़िलिस्तीन का विवाद अब भी हल नहीं हुआ है , और अमेरिका तथा इज़राइल ने ईरान के विरुद्ध अपनी सैन्य कार्रवाई का विस्तार कर दिया है. केवल पिछले वर्ष 2025 में ही विश्व के 50 से अधिक देशों ने प्रत्यक्ष युद्ध या सशस्त्र संघर्ष का सामना किया. यह शीत युद्ध की समाप्ति के बाद का सबसे ऊँचा स्तर है. हर महीने औसतन 20,000 से अधिक लोग युद्ध के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं. स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान ( SIPRI) के आँकड़ों के अनुसार , 2025 में विश्व का कुल सैन्य व्यय 2.887 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया , जो लगातार ग्यारहवें व...