अमेरिका के प्रति कठोर नीति
“आक्रमणकारी की प्रकृति नहीं बदलती"
“अस्थिरता और अव्यवस्था पैदा करने का
मुख्य कारण अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिमी गुट है”
■ “जब तक साम्राज्यवाद मौजूद है, तब तक अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था केवल अर्थहीन
खाली वादे हैं”
■ “परमाणु
हथियारों का स्वामित्व ही साम्राज्यवादी आक्रमण की महत्वाकांक्षाओं को समाप्त करने
का एकमात्र साधन है”
■ “हमारे
प्रति अमेरिका का शत्रुतापूर्ण दृष्टिकोण और गुंडागर्दी जैसा स्वभाव बिल्कुल भी
नहीं बदला है”
जनवादी कोरिया ने 19 से 25 फरवरी के बीच आयोजित कोरिया की वर्कर्स पार्टी की 9वीं कांग्रेस में प्रस्तुत कार्य-समापन रिपोर्ट के माध्यम से वर्तमान अंतरराष्ट्रीय
स्थिति का विश्लेषण किया और अमेरिका के प्रति अपनी नीति सार्वजनिक की.
सबसे पहले वर्तमान अंतरराष्ट्रीय
स्थिति के बारे में कहा गया कि “आज की
दुनिया पाँच वर्ष पहले की दुनिया से पूरी तरह अलग है और अंतरराष्ट्रीय संबंध
अव्यवस्था और उथल-पुथल के भंवर में प्रवेश कर चुके हैं.”
पाँच वर्ष पहले अर्थात 2021, जब कोविड-19 महामारी चरम पर थी, अमेरिका
में कैपिटल
हिल पर भीड़ द्वारा कब्ज़े की घटना हुई थी, जब बाइडेन प्रशासन सत्ता में आया था, और
अमेरिकी सेना अफगानिस्तान
से लगभग भागते हुए वापस लौटी थी.
उस समय तक अमेरिका के पतन के संकेत
अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई दे रहे थे.
किन्तु इसके बाद यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, इज़राइल ने फिलिस्तीन सहित मध्य पूर्व के कई देशों के साथ युद्ध किया और अंततः अमेरिका के
साथ मिलकर ईरान
पर भी आक्रमण किया.
इसके अलावा अमेरिका ने चीन को अलग-थलग करने और रोकने की
नीति (डिकपलिंग) अपनाई और कंपनियों को अमेरिका वापस लाने के लिए रीशोरिंग नीति को बढ़ावा दिया, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में अव्यवस्था पैदा हुई और अंततः भारी शुल्क (टैरिफ) लगाए गए.
स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि तीसरे विश्व युद्ध की आशंका व्यक्त की जाने लगी और
अंतरराष्ट्रीय समाज संकट तथा अव्यवस्था में घिर गया.
जनवादी कोरिया ने इस स्थिति का मुख्य
कारण अमेरिका को बताया.
जनवादी कोरिया ने कहा कि “अमेरिका की प्रभुत्ववादी नीति और मनमानी के कारण
दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में शांति और सुरक्षा की नींव बुरी तरह हिल गई है,
सशस्त्र संघर्ष लगातार हो रहे हैं और
अंतरराष्ट्रीय स्थिति अधिक अव्यवस्थित दिशा में बढ़ती जा रही है. समय के साथ यह और
अधिक परिवर्तनशील और अप्रत्याशित होती जा रही है.”
अर्थात यह अनुमान व्यक्त किया गया कि
वर्तमान अव्यवस्था समाप्त होने के बजाय और अधिक बढ़ेगी.
जनवादी कोरिया के अनुसार अमेरिका
अपने प्रभुत्व के पतन को रोकने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष भड़काने वाली लापरवाह और हिंसक नीतियाँ अपना रहा है, इसलिए जब तक अमेरिका निर्णायक रूप से कमजोर नहीं
होता, तब तक विश्व की अव्यवस्था और बढ़
सकती है.
जनवादी कोरिया ने कहा कि “राष्ट्रीय संप्रभुता का खुला उल्लंघन, अंतरराष्ट्रीय कानून का क्रूर दुरुपयोग, शीत युद्ध के बाद पहली बार उत्पन्न वैश्विक
सुरक्षा संकट, विभिन्न देशों में राजनीतिक-आर्थिक
अव्यवस्था—ये सब आज की दुनिया की वास्तविकताएँ हैं.”
साथ ही यह भी कहा गया कि “बल ही न्याय है” के तर्क के आधार पर एकतरफा प्रभुत्व स्थापित करने
की कोशिश करते हुए वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और प्रचलित परंपराओं को नष्ट
करने तथा अव्यवस्था फैलाने का मुख्य कारण अमेरिका और उसके नेतृत्व वाला पश्चिमी गुट है.
जनवादी कोरिया के अनुसार “अमेरिका तथाकथित ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर अन्य
देशों की संप्रभुता, क्षेत्रीय
अखंडता और सुरक्षा हितों की परवाह किए बिना केवल अपने प्रभुत्ववादी उद्देश्यों को
पूरा करने के लिए ‘बल के माध्यम से शांति’ का नारा देकर संप्रभु देशों के विरुद्ध
आक्रमण और सैन्य शक्ति का उपयोग करता है.”
आम तौर पर “अमेरिका फर्स्ट” (America First) या MAGA को इस रूप में समझा जाता है कि अमेरिका अन्य देशों के मामलों से दूरी
बनाकर अपने आंतरिक मामलों पर ध्यान देगा.
लेकिन जनवादी कोरिया ने इसे अलग
दृष्टिकोण से देखा. उसके अनुसार यह नीति अमेरिका को “अंतरराष्ट्रीय गुंडा” बनाती है, जो अपने हितों के लिए अन्य देशों पर आक्रमण करने से नहीं हिचकता.
जनवादी कोरिया ने कहा कि “दुनिया को अस्थिर और बेचैन बनाने वाली अमेरिका की
मनमानी हमारे लिए कोई नई बात नहीं है; यह उसी प्रभुत्ववादी और गुंडागर्दी वाली परंपरा का निरंतर विस्तार है
जिसे हमने लंबे समय से देखा है.”
जनवादी कोरिया के अनुसार यदि दुनिया
अमेरिका के बारे में अपने भ्रम को त्याग दे, तो उसे यह समझ में आएगा कि यह वही व्यवहार है जिसका सामना जनवादी
कोरिया लंबे समय से करता रहा है.
इसी प्रकार की बात 1 मार्च को अमेरिका द्वारा ईरान पर आक्रमण के बारे में जनवादी कोरिया के विदेश
मंत्रालय के प्रवक्ता के बयान में भी कही गई.
उस बयान में कहा गया कि “क्षेत्र में लंबे समय से जारी अमेरिका की सैन्य
धमकियाँ अंततः वास्तविक सैन्य आक्रमण में बदलेंगी—यह पहले से अनुमानित था और यह
अमेरिका की प्रभुत्ववादी तथा गुंडागर्दी वाली प्रकृति का अनिवार्य परिणाम है.”
जनवादी कोरिया ने आगे कहा कि
“अमेरिका की प्रभुत्ववादी नीति के
कारण बहुपक्षीय व्यवस्था पर आधारित वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में गंभीर
परिवर्तन हो रहे हैं और न्याय तथा शक्ति के मूल्य का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है.”
यहाँ “बहुपक्षीय व्यवस्था” से तात्पर्य ऐसी प्रणाली से है जिसमें कई देश
परस्पर दायित्वों के साथ जुड़े होते हैं, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र.
लेकिन अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय
कानून और संस्थाओं की अनदेखी करते हुए युद्ध छेड़ने या आर्थिक प्रतिबंध लगाने से
विश्व व्यवस्था बलशाली द्वारा दुर्बल के शोषण वाले “जंगल के नियम” की ओर बढ़ गई है.
आज की दुनिया उस कथन को स्पष्ट रूप
से दर्शाती है जो फ्रांसीसी दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल ने कहा था—
“शक्ति के बिना न्याय असहाय होता है,
और न्याय के बिना शक्ति अत्याचार बन
जाती है.”
जनवादी कोरिया ने यह भी कहा कि यूरोप, जो दो विश्व युद्धों का जन्मस्थान रहा है, वहाँ भी नाटो के विस्तार के कारण पिछले 80 वर्षों में पहली बार गंभीर सुरक्षा संकट पैदा हुआ है, जिससे यूक्रेन युद्ध हुआ.
इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया कि कोरियाई प्रायद्वीप और आसपास के
क्षेत्र अमेरिका
और उसके सहयोगियों की निरंतर शत्रुतापूर्ण नीतियों के कारण स्थायी तनाव और
अस्थिरता की स्थिति में हैं.
जनवादी कोरिया ने कहा कि वर्तमान
अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति से यह स्पष्ट हो गया है कि
“यदि शक्ति मजबूत हो तो किसी भी
परिस्थिति में अस्तित्व और विकास संभव है, लेकिन यदि शक्ति कमजोर हो तो देश प्रतिबंधों और आक्रमण का शिकार बन
सकता है और अंततः उसकी संप्रभुता तथा क्षेत्र दोनों छिन सकते हैं.”
इसी संदर्भ में जनवादी कोरिया ने कहा
कि
“जब तक साम्राज्यवाद मौजूद है,
अंतरराष्ट्रीय कानून और व्यवस्था
केवल खाली वादे हैं. केवल कानून और व्यवस्था की बात करके कुछ भी सुरक्षित नहीं रखा
जा सकता.”
इसके अनुसार “शक्ति ही शक्ति का सम्मान करती है और शक्तिशाली
शक्ति—विशेष रूप से परमाणु हथियार—ही साम्राज्यवादी आक्रमण को रोकने का एकमात्र
साधन है.”
अर्थात एक अराजक विश्व में जीवित
रहने के लिए शक्ति आवश्यक है और उस शक्ति का मुख्य तत्व परमाणु हथियारों का स्वामित्व है.
जनवादी कोरिया ने यह भी कहा कि फिलिस्तीन, वेनेज़ुएला और ईरान जैसे देश, जिनके पास परमाणु हथियार नहीं हैं, उन पर आक्रमण हुआ, जबकि परमाणु हथियार संपन्न जनवादी कोरिया
पर आक्रमण नहीं हुआ, जो
उसके तर्क को मजबूत करता है.
जनवादी कोरिया ने यह भी कहा कि “प्रभुत्व और अधीनता के विरुद्ध तथा स्वतंत्रता और
समानता की स्थापना के लिए प्रगतिशील मानवता का संघर्ष बढ़ता जाएगा, और यह इतिहास की अनिवार्य प्रक्रिया है.”
इसके साथ ही यह भविष्यवाणी भी की गई
कि बहुध्रुवीय
विश्व व्यवस्था की स्थापना की दिशा में संघर्ष तेज होगा और जनवादी कोरिया स्वयं को इस प्रक्रिया के केंद्र
में मानता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पिछले
पाँच वर्षों में पार्टी ने अंतरराष्ट्रीय स्थिति का विश्लेषण कर उचित विदेश नीति
अपनाई और परमाणु
शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में अपनी स्थिति को अपरिवर्तनीय बना दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि परमाणु निरस्त्रीकरण संभव नहीं है.
वास्तव में अमेरिका के भीतर भी यह
विचार बढ़ रहा है कि जनवादी कोरिया से परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग करना व्यावहारिक नहीं है.
अंत में जनवादी कोरिया ने अमेरिका के
प्रति अपनी नीति स्पष्ट की.
उसने कहा कि “हमारे प्रति अमेरिका का जन्मजात शत्रुतापूर्ण
दृष्टिकोण और बल प्रयोग की आदत बिल्कुल नहीं बदली है. आक्रमणकारी की प्रकृति को
अस्थायी रूप से छिपाया जा सकता है, लेकिन
बदला नहीं जा सकता.”
इसलिए जनवादी कोरिया ने घोषणा की कि
वह अमेरिका
के साथ टकराव के लिए हमेशा तैयार रहेगा और कठोर रुख बनाए रखेगा.
हालाँकि जनवादी कोरिया ने यह भी कहा
कि यदि अमेरिका जनवादी कोरिया को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में स्वीकार करे
और शत्रुतापूर्ण नीति समाप्त करे, तो
दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध बनाने में कोई बाधा नहीं है.
अर्थात जनवादी कोरिया के अनुसार जनवादी कोरिया-अमेरिका संबंधों का भविष्य पूरी तरह अमेरिका के व्यवहार पर निर्भर करता है.
जनवादी कोरिया ने कहा कि “शांतिपूर्ण सहअस्तित्व हो या स्थायी टकराव—हम हर
स्थिति के लिए तैयार हैं, लेकिन
अंतिम निर्णय अमेरिका के हाथ में है.”
इसके साथ ही जनवादी कोरिया ने संकेत
दिया कि वह परमाणु
और उन्नत हथियारों के विकास, आंतरिक
एकता को मजबूत करने और मित्र देशों के साथ संबंध बढ़ाने के प्रयास जारी रखेगा, ताकि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आगे बढ़ाया जा
सके.

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