एक नई दुनिया की भोर: बहुध्रुवीयता तथा जनवादी कोरिया–चीन–रूस
2008 की
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंदी के बाद विश्व पूंजीवादी व्यवस्था में तीव्र परिवर्तन
आया. जिस व्यवस्था को बनाए रखने वाले अनेक नियम थे, उन्हीं नियमों का नेतृत्व करने वाली शक्तियों द्वारा उन्हें स्वयं
क्षति पहुँचाई जा रही है और नष्ट किया जा रहा है. अनेक लोग यह कहते हुए अफसोस
प्रकट करते हैं कि "अतीत
की दुनिया हमेशा के लिए समाप्त हो चुकी है."
आज पूरी दुनिया युद्धों और संघर्षों
से घिरी हुई है. रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष जारी है, इज़राइल और फ़िलिस्तीन का विवाद अब भी हल नहीं
हुआ है, और अमेरिका तथा इज़राइल ने ईरान के
विरुद्ध अपनी सैन्य कार्रवाई का विस्तार कर दिया है.
केवल पिछले वर्ष 2025 में ही विश्व के 50 से अधिक देशों ने प्रत्यक्ष युद्ध या सशस्त्र संघर्ष का सामना किया.
यह शीत युद्ध की समाप्ति के बाद का सबसे ऊँचा स्तर है.
हर महीने औसतन 20,000 से अधिक लोग युद्ध के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं.
स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति
अनुसंधान संस्थान (SIPRI) के
आँकड़ों के अनुसार, 2025 में
विश्व का कुल सैन्य व्यय 2.887 ट्रिलियन
अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया, जो
लगातार ग्यारहवें वर्ष वृद्धि को दर्शाता है.
इस उथल-पुथल के बीच, ट्रम्प के पुनः व्हाइट हाउस लौटने के बाद
ग्रीनलैंड और कनाडा जैसे क्षेत्रों को अमेरिका में शामिल करने की माँग जैसी
चौंकाने वाली कार्रवाइयाँ सामने आईं.
स्थिति केवल याल्टा व्यवस्था (Yalta System) के विघटन तक सीमित नहीं है, बल्कि वेस्टफेलिया व्यवस्था (Westphalian
System) तक भी हिल चुकी है.
1945 में
द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं ने याल्टा में मिलकर युद्धोत्तर
विश्व व्यवस्था स्थापित की थी. यही याल्टा व्यवस्था थी. इस व्यवस्था ने विश्व को अमेरिका और सोवियत
संघ के प्रभाव क्षेत्रों में विभाजित किया तथा शीत युद्ध युग की मूल संरचना बनाई.
लंबे समय तक यही अंतरराष्ट्रीय संबंधों की धुरी रही.
वेस्टफेलिया व्यवस्था 1648 में यूरोप के तीस वर्षीय युद्ध को समाप्त करने
वाली वेस्टफेलिया
संधि से
उत्पन्न हुई. इसका मूल सिद्धांत यह है कि प्रत्येक देश दूसरे देशों के आंतरिक
मामलों में हस्तक्षेप न करे और उनकी संप्रभुता का सम्मान करे. राष्ट्रीय संप्रभुता,
क्षेत्रीय अखंडता तथा अहस्तक्षेप
इसके प्रमुख सिद्धांत हैं.
इस प्रकार लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय
समाज को सहारा देने वाली पुरानी व्यवस्थाओं का डगमगाना 1848 में मार्क्स और एंगेल्स द्वारा "कम्युनिस्ट घोषणापत्र" में लिखे गए इस कथन की याद दिलाता है—
"जो कुछ
स्थिर है वह हवा में विलीन हो जाता है, और जो कुछ पवित्र है उसका अपमान किया जाता है."
उन्होंने सामंतवाद से पूंजीवाद में
संक्रमण के दौरान सामंती समाज के पुराने नियमों के टूटने का वर्णन किया था.
क्या आज पूंजीवादी विश्व को सहारा
देने वाली वे सभी "स्थिर" और "पवित्र" चीजें भी उसी प्रकार की नियति का सामना नहीं कर
रही हैं?
पूंजी का ऐतिहासिक परिवर्तन
अब तक के पूंजीवाद के इतिहास पर
दृष्टि डालें तो पता चलता है कि उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ-साथ प्रमुख
पूंजी का स्वरूप लगातार बदलता रहा है.
15वीं
शताब्दी के उत्तरार्ध से 18वीं
शताब्दी के उत्तरार्ध तक का काल व्यापारिक पूंजीवाद का युग था.
महान समुद्री खोजों के युग में
पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैंड और ब्रिटेन जैसे समुद्री शक्तिशाली देशों ने समुद्री व्यापार,
उपनिवेशों की लूट और दास व्यापार के
माध्यम से अपार संपत्ति अर्जित की.
व्यापारिक पूंजी ने सामंती उत्पादन प्रणाली को विघटित किया और पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था की नींव रखी.
18वीं
शताब्दी के उत्तरार्ध में आई प्रथम औद्योगिक क्रांति औद्योगिक पूंजी द्वारा व्यापारिक पूंजी को
प्रतिस्थापित करने का निर्णायक मोड़ बनी.
19वीं
शताब्दी के मध्य में ब्रिटेन से शुरू होकर फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका ने औद्योगिक क्रांति को पूरा किया, जिसके परिणामस्वरूप पश्चिमी यूरोप और उत्तरी
अमेरिका में औद्योगिक पूंजी प्रमुख शासक शक्ति बन गई.
औद्योगिक पूंजी ने उत्पादन प्रक्रिया
में गहराई से हस्तक्षेप किया, नई
तकनीकों और संगठनात्मक तरीकों को अपनाया तथा श्रम उत्पादकता में वृद्धि की.
किन्तु इसके साथ ही इसने पूंजीवाद के
अंतर्निहित विरोधाभासों—अतिउत्पादन के संकट और लाभ दर में गिरावट—को और भी गंभीर
बना दिया.
1870 के दशक की द्वितीय औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पादन और पूंजी के संकेन्द्रण के साथ
जर्मनी और अमेरिका में कार्टेल और ट्रस्ट जैसे एकाधिकार संगठन उभरने लगे.
विश्व धीरे-धीरे साम्राज्यवाद के युग में प्रवेश कर गया.
1970 के दशक
में वित्तीय पूंजी का उदय
1970 के दशक
में स्वर्ण-आधारित
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था (Gold Standard Bretton Woods System) का पतन, तेल संकट तथा फोर्डवाद (Fordism) का
संकट विकसित पूंजीवादी देशों को मुद्रास्फीतिजनित मंदी(Stagflation) की स्थिति में ले गया.
ब्रिटेन और अमेरिका में नवउदारवाद (Neoliberalism) के उदय के साथ वित्तीय पूंजी पर लगे अवरोध हटा
दिए गए.
वित्तीय पूंजी धीरे-धीरे औद्योगिक
पूंजी पर हावी होने लगी और अंततः पूंजीवादी समाज की सबसे शक्तिशाली प्रभुत्वशाली
शक्ति बन गई.
विशेष रूप से निर्णायक क्षण
1999 में अमेरिका में आया. उस समय अमेरिकी
कांग्रेस ने "ग्राम-लीच-ब्लाइली
अधिनियम (Gramm-Leach-Bliley Act)" पारित किया.
इस कानून के पारित होने से पहले
1933 में बनाया गया ग्लास-स्टीगल अधिनियम (Glass-Steagall
Act) लागू था, जिसने बैंकों की भूमिका को कड़ाई से अलग कर रखा
था.
यह कानून आम लोगों की जमा राशि
स्वीकार कर ऋण देने वाले वाणिज्यिक बैंकों (Commercial Banks) तथा शेयरों और बांडों का व्यापार करने वाले निवेश बैंकों (Investment Banks) को पूरी तरह अलग रखता था.
यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि
1929 की महामंदी (Great
Depression) के समय की तरह सट्टेबाज़ी में फँसे
बैंक फिर से जमाकर्ताओं की पूंजी न गंवा दें.
लेकिन 1999 के ग्राम-लीच-ब्लाइली अधिनियम ने इस लंबे समय से चले आ रहे सुरक्षा कवच को लगभग
समाप्त कर दिया.
अब वाणिज्यिक बैंक भी निवेश बैंकिंग
कर सकते थे तथा बीमा कंपनियों के साथ स्वतंत्र रूप से विलय या गठबंधन कर सकते थे.
बैंकिंग, प्रतिभूति (सिक्योरिटीज़) तथा बीमा पूंजी के आपस
में मिल जाने से विशाल वित्तीय दैत्य (Financial Giants) अस्तित्व में आए.
यह परिवर्तन उस निर्णायक मोड़ का
प्रतीक बना, जब वित्तीय पूंजी उत्पादन करने और
तकनीक विकसित करने वाली वास्तविक अर्थव्यवस्था (Real Economy) पर नियंत्रण स्थापित करने वाली प्रमुख शक्ति बन गई.
वित्तीय कंपनियाँ अब केवल उद्योगों
की सहायता करने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वे कंपनियों के प्रबंधन को भी नियंत्रित करने लगीं और भारी
मुनाफा कमाने लगीं.
इसके बाद उत्पादन गतिविधियों की
अपेक्षा शेयर मूल्यों में हेरफेर, जटिल
वित्तीय उत्पादों का व्यापार तथा सट्टेबाज़ी जैसी वित्तीय गतिविधियाँ अर्थव्यवस्था
का केंद्र बनती चली गईं.
2017 तक ब्लैकरॉक (BlackRock), वैनगार्ड (Vanguard) तथा स्टेट स्ट्रीट (State Street) जैसी तथाकथित "बिग थ्री" कंपनियाँ S&P 500 की
लगभग 88% कंपनियों में सबसे बड़ी शेयरधारक बन चुकी थीं.
इनकी कुल हिस्सेदारी S&P
500 के कुल बाजार पूंजीकरण का लगभग
40% थी और वे कुल मतदान अधिकारों के लगभग एक-चौथाई पर नियंत्रण रखती थीं.
अब बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ व्यक्तिगत
पूंजीपतियों या औद्योगिक पूंजीपतियों द्वारा नहीं, बल्कि वित्तीय एकाधिकार पूंजी के नेटवर्क द्वारा नियंत्रित की जाने लगीं.
कंपनियों ने तकनीकी विकास की अपेक्षा
उत्पादन सुविधाओं को विदेशों में स्थानांतरित करने तथा अपने ही शेयरों की पुनर्खरीद (Share
Buyback) और लाभांश बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया.
इससे विनिर्माण क्षेत्र का पतन तथा डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन (Deindustrialization) अर्थात् औद्योगिक आधार का क्षरण हुआ.
वित्तीय एकाधिकार पूंजी के प्रभुत्व
के अधीन व्यवस्थागत संकट
वित्तीय एकाधिकार पूंजी के प्रभुत्व
के अधीन आधुनिक पूंजीवाद आर्थिक, राजनीतिक,
सामाजिक, पारिस्थितिक तथा सांस्कृतिक—सभी क्षेत्रों में
गहरे संकट में फँस गया है.
यह संकट सीधे हमारे दैनिक जीवन को भी प्रभावित करता है.
आर्थिक क्षेत्र में वित्तीय पूंजी
द्वारा वास्तविक अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने के कारण संपूर्ण
अर्थव्यवस्था वित्तीय सट्टेबाज़ी पर आधारित होती चली गई.
अमेरिका में 2025 की चौथी तिमाही तक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी घटकर केवल
9.4% रह गई.
जर्मनी, जापान और ब्रिटेन जैसे पारंपरिक औद्योगिक
महाशक्ति देश भी इसी प्रकार के वि-औद्योगीकरण
(Deindustrialization)के मार्ग पर चल रहे हैं.इसका मुख्य उदाहरण
अमेरिका की बोइंग
(Boeing) कंपनी है.
एक समय विश्व की सर्वश्रेष्ठ
इंजीनियरिंग कंपनी मानी जाने वाली बोइंग ने वित्तीयकरण (Financialization) के बाद वित्तीय लक्ष्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता
दे दी.
2010 से 2019
के बीच कंपनी ने अपने अतिरिक्त नकद (Free
Cash Flow) का 74 प्रतिशत अपने ही शेयरों की पुनर्खरीद पर खर्च कर दिया.
परिणामस्वरूप सुरक्षा की उपेक्षा हुई
और अंततः 737 MAX दुर्घटनाओं
में सैकड़ों लोगों की जान चली गई.
दक्षिण कोरिया भी इसका अपवाद नहीं है.
बड़ी कंपनियाँ विदेशों में अपने
उत्पादन केंद्रों का विस्तार कर रही हैं तथा वित्तीय निवेश और रियल एस्टेट
सट्टेबाज़ी में अधिक रुचि ले रही हैं.
इसके परिणामस्वरूप देश का विनिर्माण
आधार लगातार कमजोर होता जा रहा है.
युवाओं के लिए अच्छे रोजगार प्राप्त
करना कठिन होता जा रहा है, जबकि
अस्थायी रोजगार तथा प्लेटफ़ॉर्म आधारित श्रम में वृद्धि हो रही है.
"योंगक्कुल
(영끌)"
अर्थात अपनी सारी क्षमता से अधिकतम
ऋण लेकर संपत्ति खरीदना तथा "पितथू(빚투)"
अर्थात कर्ज लेकर निवेश करना सामान्य
जीवन का हिस्सा बन चुके हैं.
आर्थिक विकास दर धीमी होती जा रही है, लेकिन मकानों की कीमतें और महँगाई लगातार बढ़ रही हैं तथा घरेलू ऋण इतिहास के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच चुका है.
वित्तीय एकाधिकार पूंजी के प्रभुत्व
के अधीन व्यवस्थागत संकट जारी है और वित्तीय एकाधिकार पूंजी ने "रिवॉल्विंग डोर" नियुक्तियों (सरकार और निजी
क्षेत्र के बीच अधिकारियों का आवागमन), लॉबिंग, चुनावी
चंदे तथा मीडिया पर प्रभाव के माध्यम से राज्य को अपने हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक उपकरण
में बदल दिया.
फिल्मों या धारावाहिकों में इस
प्रकार की कहानियाँ बार-बार दिखाई देने का कारण यही है कि वे वास्तविकता से मेल
खाती हैं.
अब वास्तविक सुधारों पर राजनीतिक जगत
में भी चर्चा करना कठिन हो गया है.
6 जनवरी 2021
को अमेरिका की कैपिटल (संसद भवन) पर हुआ हमला इस संस्थागत विघटन का प्रतीकात्मक
उदाहरण था.
2025 के
जर्मन चुनाव में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) को केवल 16.4 प्रतिशत मत मिले, जो उसकी ऐतिहासिक पराजय थी.
इसी प्रकार V-Dem संस्थान ने यह संकेत दिया कि अमेरिका अब "उदार लोकतंत्र (Liberal Democracy)" की श्रेणी में नहीं आता.
दक्षिण कोरिया में भी बड़े औद्योगिक
समूहों (चैबोल) और वित्तीय पूंजी का प्रभाव राजनीतिक व्यवस्था में गहराई तक समा
चुका है.
"नियमन
में ढील (Regulatory Relaxation)" के नाम पर बड़े उद्योगों को विशेष लाभ देने वाली नीतियाँ जारी हैं.
रियल एस्टेट नीतियाँ भी अक्सर
सट्टेबाज़ी पर अंकुश लगाने के बजाय ऋण को बढ़ावा देती हैं.
परिणामस्वरूप जनता के मन में यह
प्रश्न उठने लगा है—
"राजनीति
आखिर किसके लिए है?"
यह भावना राजनीतिक उदासीनता और
कभी-कभी चरमपंथी विकल्पों की ओर झुकाव का कारण बनती है.
आर्थिक असमानता और सामाजिक
विरोधाभासों की तीव्रता तो और भी स्पष्ट है.
2025 में
अमेरिका में शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का
31.7 प्रतिशत था, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास केवल 2.5 प्रतिशत संपत्ति थी.
दक्षिण कोरिया भी OECD देशों में सबसे अधिक संपत्ति असमानता वाले देशों
में शामिल है.
सियोल के खांगनाम क्षेत्र के अपार्टमेंटों की कीमतें लगातार आसमान
छू रही हैं, जबकि युवा पीढ़ी आवास असुरक्षा से
जूझ रही है.
जैसे अमेरिका में "अमेरिकन ड्रीम" धीरे-धीरे समाप्त हो गया, वैसे ही दक्षिण कोरिया में भी अपना घर खरीदने का
सपना दूर होता जा रहा है.
पहले कम से कम योग्यता और मेहनत के
आधार पर सामाजिक उन्नति संभव मानी जाती थी, लेकिन अब यह लगभग असंभव हो गई है.
वर्गीय संघर्ष, लैंगिक संघर्ष, पीढ़ियों के बीच संघर्ष और क्षेत्रीय संघर्षों ने पूरे समाज को थका
दिया है.
पूंजीवाद असीमित आर्थिक विकास चाहता
है, जबकि पृथ्वी सीमित संसाधनों वाली है.
वित्तीय पूंजी कंपनियों को
पर्यावरणीय लागत समाज पर थोपने के लिए प्रोत्साहित करती है.
जलवायु परिवर्तन, सूक्ष्म धूल (Fine Dust), प्लास्टिक प्रदूषण तथा जैव विविधता में कमी अब
सीधे हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं.
दक्षिण कोरिया भी असामान्य मौसम,
भीषण वर्षा, हीटवेव और सूक्ष्म धूल जैसी समस्याओं का सामना कर
रहा है, लेकिन कंपनियों द्वारा पर्यावरण
संरक्षण में निवेश अब भी बहुत सीमित है.
और अब मुख्यधारा के सिद्धांत भी विफल हो चुके हैं.
हाल ही में "इतिहास का अंत (The End of History)"
के लेखक फ़्रांसिस फुकुयामा ने स्वयं स्वीकार किया कि उनकी सोच गलत थी.
2008 की
वित्तीय मंदी के बाद
नवउदारवाद से जुड़े अनेक मिथक लगातार टूटते गए.
आज भी अर्थशास्त्री बढ़ती असमानता और
वित्तीय अस्थिरता की संतोषजनक व्याख्या नहीं कर पा रहे हैं.
दक्षिण कोरिया में भी यह पुरानी
धारणा कि—
"यदि
आर्थिक विकास होगा, तो सभी
समृद्ध होंगे"
—अब लोगों को विश्वास दिलाने में असफल
हो रही है.
ये सभी संकट वित्तीय एकाधिकार पूंजी
की संचय-प्रक्रिया (Accumulation Logic) का अनिवार्य परिणाम हैं.
भारत में भी हमारे जीवन को कठिन
बनाने वाली महँगी आवास व्यवस्था, अस्थिर
रोजगार, भविष्य के प्रति असुरक्षा और
पर्यावरणीय विनाश किसी दूर देश की कहानी नहीं, बल्कि हमारे चारों ओर घट रही वास्तविकताएँ हैं.
जब हम इस व्यवस्थागत संकट का सीधे
सामना करेंगे, तभी वास्तविक विकल्पों का मार्ग भी
दिखाई देने लगेगा.
सुधारों का गतिरोध और अति-दक्षिणपंथ
(Far Right) का उदय
आधुनिक पूंजीवाद की सबसे बड़ी समस्या
उसका संरचनात्मक
(Structural) विरोधाभास है.
सुधार अत्यंत आवश्यक हैं, लेकिन वास्तविक परिवर्तन के लिए वित्तीय एकाधिकार
पूंजी के मूल हितों को चुनौती देनी पड़ेगी.
इसी कारण व्यवस्था एक ऐसे गतिरोध में
फँस गई है जहाँ परिवर्तन लगभग असंभव प्रतीत होता है.
वित्तीय पूंजी ने राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति—तीनों क्षेत्रों पर
गहरा नियंत्रण स्थापित कर लिया है.
इस कारण बड़े बैंकों का विभाजन,
वित्तीय लेन-देन कर (Financial
Transaction Tax) लागू करना अथवा
वित्तीयकरण से मुक्ति (De-financialization)
जैसे मूलभूत सुधार अब राजनीतिक
एजेंडे से लगभग गायब हो चुके हैं.
जितना अधिक सुधार असफल होते हैं और
जनता का असंतोष बढ़ता है, उतना
ही उसका गुस्सा दक्षिणपंथी लोकलुभावन (Right-wing Populist) और सत्तावादी शक्तियों की ओर मुड़ता है.
आर्थिक संकट और सामाजिक असुरक्षा
बढ़ने पर अति-दक्षिणपंथी शक्तियों द्वारा "मजबूत नेता" और "राष्ट्र
सर्वोपरि" जैसे नारों के साथ अपना प्रभाव बढ़ाना इतिहास में बार-बार देखने को
मिला है.
हाल के वर्षों में यूरोप और लैटिन
अमेरिका में अति-दक्षिणपंथ का उदय
हाल के वर्षों में यूरोप और लैटिन
अमेरिका में अति-दक्षिणपंथी शक्तियों का उभार इसी गतिरोध का ठोस प्रमाण है.
यूरोप में Alternative for
Germany (AfD) ने जून 2026 के जनमत सर्वेक्षणों में 29 प्रतिशत समर्थन प्राप्त किया और वह अब भी मजबूत स्थिति में है. उसने
Christian Democratic Union/Christian Social Union (CDU/CSU) को भी पीछे छोड़ दिया.
फ्रांस में Jordan Bardella के नेतृत्व वाले National Rally (RN) को 2027 के राष्ट्रपति चुनाव के प्रथम चरण के मतदान इरादा सर्वेक्षणों में
32–37 प्रतिशत समर्थन प्राप्त हुआ और वह सबसे आगे रहा.
ब्रिटेन में Nigel Farage के नेतृत्व वाली Reform UK ने जनमत सर्वेक्षणों में लेबर पार्टी और
कंज़र्वेटिव पार्टी दोनों को पीछे छोड़ दिया, जिससे उसके सत्ता में आने की संभावना काफी बढ़ गई.
इटली में Giorgia Meloni की सरकार दक्षिणपंथी गठबंधन को बनाए रखते हुए
अपना प्रभाव बढ़ा रही है.
साथ ही ऑस्ट्रिया की Freedom
Party of Austria (FPÖ) तथा स्वीडन की Sweden
Democrats (SD) भी सरकारी नीतियों पर प्रत्यक्ष
प्रभाव डाल रही हैं.
पुर्तगाल और रोमानिया में भी अति-दक्षिणपंथी शक्तियों का उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिल रहा है.
लैटिन अमेरिका में भी दक्षिणपंथ की
ओर झुकाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है.
30 जून को पेरू में Keiko Fujimori ने अत्यंत मामूली अंतर से राष्ट्रपति चुनाव जीत
लिया.
यह उसकी चौथी कोशिश में मिली सफलता
थी, जिसमें "कड़ा कानून-व्यवस्था" और अपराध के विरुद्ध सख्त कार्रवाई को प्रमुख
चुनावी मुद्दा बनाया गया.
इसी प्रकार, प्रगतिशील विचारधारा वाले राष्ट्रपति
Gustavo Petro के नेतृत्व वाले कोलंबिया में भी
21 जून के राष्ट्रपति चुनाव में अति-दक्षिणपंथी वकील
Abelardo de la Espriella ने
वामपंथी उम्मीदवार को बहुत कम अंतर से पराजित कर दिया.
उसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का
समर्थन प्राप्त था और उन्होंने "अपराध के विरुद्ध युद्ध" तथा कठोर सुरक्षा नीति को चुनावी मुद्दा बनाया.
चिली के José Antonio Kast, अर्जेंटीना के Javier Milei तथा अल सल्वाडोर के Nayib Bukele पहले से ही सत्ता में हैं या अत्यधिक प्रभावशाली
स्थिति में हैं.
ये सभी घटनाएँ वित्तीय एकाधिकार
पूंजीवाद द्वारा उत्पन्न आर्थिक अस्थिरता, औद्योगिक क्षरण, अत्यधिक
आर्थिक असमानता तथा सामाजिक विभाजन का प्रत्यक्ष परिणाम हैं.
सामान्य लोग महँगाई, बेरोज़गारी और कानून-व्यवस्था की समस्याओं से
परेशान होकर पारंपरिक राजनीतिक अभिजात वर्ग और वामपंथी सरकारों से निराश होते हैं
तथा अपनी आशाएँ अति-दक्षिणपंथी लोकलुभावन नेताओं पर केंद्रित करने लगते हैं.
लेकिन अति-दक्षिणपंथी शक्तियाँ
वित्तीय पूंजी के मूल प्रभुत्व को चुनौती नहीं देतीं.
इसके विपरीत वे प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और वामपंथ को शत्रु बताकर जनता के
असंतोष को दूसरी दिशा में मोड़ देती हैं तथा सत्तावादी शासन को मजबूत करती हैं.
दीर्घकाल में इससे सामाजिक संघर्ष और
अधिक गहरा होता है तथा कुछ देशों में फासीवादी प्रवृत्तियों के विकसित होने का
खतरा बढ़ जाता है.
दक्षिण कोरिया में भी इसी प्रकार
दक्षिणपंथी झुकाव के संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं.
विशेष रूप से युवाओं के बीच ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करने वाले
अति-दक्षिणपंथी विमर्श फैल रहे हैं.
रोजगार की असुरक्षा तथा अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण
भविष्य के प्रति बढ़ती निराशा "मजबूत राष्ट्र", "साम्यवाद-विरोध" और "राष्ट्रवाद" जैसे नारों के माध्यम से अभिव्यक्त हो रही है.
पूंजीवाद द्वारा युवाओं के जीवन को संकट की स्थिति में धकेल देने के कारण स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास अति-दक्षिणपंथी भावनाओं में परिवर्तित हो रहा है.
1930 के दशक
से तुलना
विश्वव्यापी अति-दक्षिणपंथ का यह
उभार 1930 के दशक के यूरोप के इतिहास से
आश्चर्यजनक समानता रखता है.
उस समय Weimar Republic प्रथम विश्व युद्ध में पराजय, Treaty of
Versailles तथा Great Depression के कारण भारी बेरोज़गारी और गरीबी से जूझ रही थी.
जब वित्तीय पूंजी और बड़े उद्योगों
का प्रभाव बढ़ा, मध्यम वर्ग कमजोर पड़ गया और सामाजिक
अस्थिरता बढ़ी, तब Adolf Hitler की नाज़ी पार्टी ने "राष्ट्रवाद", "मजबूत नेता" तथा "विदेशी शक्तियों और यहूदियों के प्रति शत्रुता" जैसे नारों के माध्यम से सत्ता
प्राप्त की.
उसने आर्थिक संकट की जिम्मेदारी
स्थापित अभिजात वर्ग और अल्पसंख्यकों पर डालकर जनता की निराशा को राजनीतिक शक्ति
में बदल दिया.
आज की स्थिति भी मूल रूप से अलग
दिखाई नहीं देती.
वित्तीय एकाधिकार पूंजी द्वारा
उत्पन्न दीर्घकालिक आर्थिक ठहराव और असमानता जनता के असंतोष को बढ़ाते हैं,
जबकि अति-दक्षिणपंथी शक्तियाँ इसका
दोष प्रवासियों,
वैश्वीकरण और वामपंथ पर डालकर समर्थन प्राप्त करती हैं.
यद्यपि वे पहले की तरह खुले रूप से
फासीवाद की घोषणा नहीं करतीं, फिर भी
उनका शासन सत्तावाद, मीडिया
पर नियंत्रण, अल्पसंख्यकों का दमन तथा उग्र
राष्ट्रवाद जैसी समान विशेषताएँ प्रदर्शित करता है.
इस प्रकार आर्थिक निराशा राजनीतिक
उग्रवाद में परिवर्तित हो जाती है.
अति-दक्षिणपंथ का उदय वास्तव में इस
बात का प्रमाण है कि पश्चिम-केंद्रित पूंजीवादी व्यवस्था स्वयं को सुधारने की
क्षमता खो चुकी है.
साथ ही यह उथल-पुथल बहुध्रुवीय विश्व
व्यवस्था की ओर संक्रमण को और तेज़ करती है.
वित्तीय पूंजी के प्रभुत्व से निराश
जनता का असंतोष जब अति-दक्षिणपंथ की ओर मुड़ रहा है, तब संप्रभुता और समानता पर आधारित नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक
स्पष्ट हो गई है.
यदि इतिहास से शिक्षा ली जाए, तो यह संकट अंततः और भी गहरे परिवर्तन का पूर्वसंकेत सिद्ध हो सकता है.
एक नई दुनिया की भोर
पूँजीवाद के अंतर्निहित (आंतरिक) विरोधाभासों ने आर्थिक मंदी को एक संरचनात्मक और व्यवस्थागत संकट में बदल दिया है. किंतु इसी के साथ इसने जनता की चेतना के जागरण तथा प्रगतिशील शक्तियों के पुनर्गठन को भी जन्म दिया है.
अमेरिका में हुए विशाल जन-प्रदर्शन,
यूरोप के श्रमिक आंदोलन तथा वामपंथी
राजनीति का पुनरुत्थान इसके प्रमाण हैं. वित्तीय कुलीनतंत्र (Financial
Oligarchy) के प्रभुत्व के विरुद्ध तथा संपत्ति
के पुनर्वितरण की माँग लगातार प्रबल होती जा रही है.
ग्लोबल साउथ, अफ्रीका और पश्चिम एशिया में हो रहे परिवर्तन
बहुध्रुवीयता (Multipolarization) की लहर
को और अधिक सशक्त बना रहे हैं.
पहले ही G20 के संयुक्त GDP से आगे निकल चुके BRICS आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव का निरंतर विस्तार करते हुए
पश्चिम-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के विकल्प के रूप में उभर रहे हैं.
अफ्रीका के साहेल (Sahel) क्षेत्र में बुर्किना फासो, माली और नाइजर ने साहेल राज्यों का गठबंधन (AES) स्थापित कर फ्रांस तथा पश्चिमी देशों के सैन्य एवं आर्थिक प्रभुत्व से
बाहर निकलते हुए स्वतंत्र विकास का मार्ग अपनाया है, और अफ्रीकी महाद्वीप के भविष्य के एक नए मॉडल को प्रस्तुत किया है.
ईरान ने भी अमेरिका और इज़राइल के
हमलों तथा नाकेबंदी के बीच अपनी संप्रभुता की रक्षा की और इसके विपरीत विजय
प्राप्त करते हुए साम्राज्यवादी वर्चस्व का प्रतिरोध करने वाले एक प्रतीकात्मक
उदाहरण के रूप में स्वयं को स्थापित किया.
ये सभी उदाहरण इस बात को सिद्ध करते
हैं कि वित्तीय एकाधिकार पूँजी और पश्चिमी साम्राज्यवाद अब विश्व को अपनी
इच्छानुसार नियंत्रित करने में सक्षम नहीं रहे हैं.
नवंबर 2021 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं केंद्रीय समिति के छठे पूर्ण अधिवेशन ने यह प्रस्ताव पारित किया कि
मार्क्सवाद के चीनीकरण (Sinicization of Marxism) की सफलता ने समाजवाद और पूँजीवाद के बीच ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा में एक
महत्वपूर्ण परिवर्तन उत्पन्न किया है.
इस प्रस्ताव में इस बात पर बल दिया
गया कि चीन का अनुभव यह सिद्ध करता है कि समाजवाद के पास अधिक व्यापक संभावनाएँ
हैं.
2025–2026 के
दौरान राष्ट्रपति कॉमरेड शी चिनफिंग ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO), BRICS तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार स्पष्ट रूप से घोषणा की कि—
"विश्व
समानता और सुव्यवस्थित बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहा है."
इस वर्ष चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने
15वीं पंचवर्षीय योजना के माध्यम से यह घोषित किया कि
समाजवादी आधुनिकीकरण की सफलता विश्व के समक्ष विकास का एक नया मॉडल प्रस्तुत कर
रही है.
इसके माध्यम से यह भी प्रदर्शित किया
गया कि पश्चिम-केंद्रित एकध्रुवीय व्यवस्था की सीमाओं से आगे बढ़ते हुए संप्रभु
समानता तथा पारस्परिक सम्मान पर आधारित नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब वास्तविकता
का रूप ले रही है.
रूस भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के
निर्माण को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है.
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2025–2026 के दौरान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार "बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था" पर बल देते हुए स्पष्ट किया कि
पश्चिम-केंद्रित एकध्रुवीय व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रह गई है.
उन्होंने विशेष रूप से कहा—
"प्रत्येक
राष्ट्र, चाहे वह आकार अथवा शक्ति में कितना
भी बड़ा या छोटा क्यों न हो, समान
संप्रभुता का अधिकारी होना चाहिए, और
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में महाशक्तियों के एकाधिकार तथा अन्य देशों के आंतरिक
मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत का सम्मान किया जाना चाहिए."
इस विचार को व्यवहार में लागू करने
के लिए रूस बेलारूस के साथ मिलकर "विविधता और बहुध्रुवीयता के लिए यूरेशियाई चार्टर" भी तैयार कर रहा है.
इस चार्टर में 21वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के नए मूलभूत
सिद्धांतों के रूप में संघर्ष के स्थान पर समान सहयोग, सभ्यताओं की विविधता का सम्मान तथा राष्ट्रीय
संप्रभुता की अक्षुण्णता को प्रमुख आधार बनाया गया है.
जनवादी कोरिया के राज्य मामलों के अध्यक्ष कॉमरेड किम
जंग उन ने फरवरी 2026 में कोरिया की वर्कर्स पार्टी की 9वीं कांग्रेस की कार्य-रिपोर्ट में कहा—
"अमेरिका
की प्रभुत्ववादी नीति के कारण वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय
संबंधों की संरचना, जो
बहुपक्षीय प्रणाली पर आधारित है, गंभीर
परिवर्तन से गुजर रही है."
उन्होंने आगे कहा—
"भविष्य
में भी स्वाधीन शक्तियाँ निरंतर सुदृढ़ होती रहेंगी और उनके प्रगतिशील संघर्ष के
माध्यम से एक न्यायपूर्ण तथा निष्पक्ष बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण को और अधिक गति
मिलेगी."
उन्होंने यह भी कहा—
"और ठीक
उसी केंद्र में हमारा राष्ट्र खड़ा है."
यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि
साम्राज्यवादी प्रभुत्व के विरुद्ध संप्रभु राष्ट्रों का संघर्ष बहुध्रुवीय विश्व
व्यवस्था के निर्माण की केंद्रीय प्रेरक शक्ति है.
जितना अधिक पश्चिमी पूँजीवाद का संकट
गहराता जाएगा, उतनी ही अधिक एक न्यायपूर्ण और स्थिर
विश्व व्यवस्था की संभावना भी खुलती जाएगी.
वित्तीय एकाधिकार पूँजी के प्रभुत्व
से उत्पन्न संकट अंततः उसी व्यवस्था की सीमाओं और कमजोरियों को उजागर करता है.
बहुध्रुवीय विश्व में संप्रभुता और
समानता की स्थापना के लिए प्रयासरत राष्ट्रों का संघर्ष तथा जनता की बढ़ती चेतना
ही वास्तविक विकल्प का आधार है.
हम आज इसी ऐतिहासिक परिवर्तन के युग
में खड़े हैं.
अतीत से प्राप्त शिक्षाओं को स्मरण
रखते हुए हमें एक बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और
सामूहिक प्रयासों को एकत्र करना चाहिए.
.jpg)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें