पश्चिमी दुनिया में व्यक्ति पूजा का पाखंड
पश्चिमी मुख्यधारा के मीडिया द्वारा
यह कहा और प्रचारित किया जाता है कि तथाकथित व्यक्ति पूजा (Personality Cult) केवल उन देशों में होती है जिन्हें पश्चिमी छद्म
लोकतंत्र (pseudo-democracies) अधिनायकवादी
(authoritarian) अथवा सर्वसत्तावादी (totalitarian)
मानते हैं.
व्यक्ति पूजा की पहचान मुख्यतः
समाजवादी देशों और कुछ हद तक फासीवादी देशों से जोड़ी गई है (विशेषकर समाजवादी
देशों से). लगभग सभी लोगों ने रोमानिया (कॉमरेड निकोलाए चाउशेस्कु), जनवादी कोरिया (कॉमरेड किम इल संग , कॉमरेड किम जंग इल तथा वर्तमान नेता कॉमरेड किम जंग उन) और पूर्व
सोवियत संघ (कॉमरेड लेनिन तथा कॉमरेड स्टालिन) में व्यक्ति पूजा के बारे में सुना
है.
क्या वास्तव में इन देशों में व्यक्ति
पूजा थी, यह एक अलग चर्चा का विषय है. अनेक
संकेत इस ओर इशारा करते हैं कि यह पूँजीवादी प्रचारतंत्र द्वारा जानबूझकर गढ़ा गया
आख्यान है, जो हर प्रकार के साम्यवाद से घृणा
करता है. यह भी उल्लेखनीय है कि कॉमरेड स्टालिन के कथित व्यक्ति पूजा के सिद्धांत
को सोवियत संघ में सत्ता में आए निकिता ख्रुश्चेव और उनके सहयोगियों ने प्रचारित
किया था.
फिर भी, यहाँ इन उदाहरणों का उल्लेख इसलिए आवश्यक है ताकि
यह तुलना की जा सके कि पश्चिम और उसका लोकतंत्र व्यक्ति पूजा को किस प्रकार समझता
है, जबकि स्वयं अपने समाज में उपस्थित
उसी प्रवृत्ति के प्रति पूरी तरह अंधा बना रहता है.
यहाँ ठहरकर पश्चिमी मीडिया द्वारा
तथाकथित "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" के नाम पर जनवादी कोरिया में व्यक्ति पूजा के संबंध में फैलाए गए मिथकों
में से एक का खंडन करना उचित होगा.
जनवादी कोरिया में कथित रूप से सत्ता
में किसी राजवंश (Dynasty) के
होने के बारे में पहले ही बहुत-सी निरर्थक बातें लिखी जा चुकी हैं.
जो लोग जनवादी कोरिया की आंतरिक राजनीति की वास्तविकताओं से परिचित
नहीं हैं, वे अक्सर यह प्रश्न पूछते हैं—क्या
कोरिया जनवादी लोकतांत्रिक गणराज्य (जनवादी कोरिया ) वास्तव में एक राजशाही है,
जिसमें किम परिवार के कॉमरेड किम जंग
उन वंशानुगत शासक के रूप में शासन करते हैं?
वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है.
राजशाही वह राजनीतिक व्यवस्था है
जिसमें राज्य की सत्ता एक ऐसे सम्राट (Monarch) के हाथों में होती है जो जीवनभर शासन करता है. ऐसे सम्राट का चयन पूरे
समाज द्वारा नहीं किया जाता, जिसमें
श्रमिक वर्ग सहित सभी सामाजिक वर्ग भाग लें, बल्कि सत्ता पर नियंत्रण रखने वाले विशिष्ट वर्ग और समूह अपने हितों
की रक्षा के लिए किसी विशेष राजपरिवार के व्यक्ति को शासक बनाते हैं.
ब्रिटेन जैसी राजशाही में
राज्याभिषेक (Coronation) का
भव्य समारोह होता है, स्वर्ण
रथों का उपयोग किया जाता है, तथाकथित
"पवित्र तेल" से अभिषेक किया जाता है और अनेक अन्य पारंपरिक धार्मिक
रस्में निभाई जाती हैं.
जनवादी कोरिया में इस प्रकार की कोई
भी राजशाही संबंधी रस्म या समारोह नहीं होता.
यदि किसी वास्तविक व्यक्ति पूजा वाले
राजतंत्र का उदाहरण देना हो, तो वह
ग्रेट ब्रिटेन है.
पहले महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय और
अब राजा चार्ल्स तृतीय संसद द्वारा लिए गए महत्वपूर्ण राष्ट्रीय निर्णयों के लिए
व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होते. किंतु इस विचित्र तथा अलोकतांत्रिक
व्यवस्था में उनके पास कानूनी अधिकार है कि वे संसद को भंग कर सकते हैं.
ऐसा 1830 में हुआ था और यदि संसद में सत्तारूढ़ वर्ग
भविष्य में राजशाही के विरुद्ध या उसके हितों के प्रतिकूल नीतियाँ अपनाए, तो सैद्धांतिक रूप से ऐसा पुनः भी हो सकता है.
इस प्रकार सम्राट अत्यंत विशेषाधिकार
प्राप्त स्थिति में होता है—
- वह संसद की नीतियों के लिए उत्तरदायी नहीं
होता,
- किंतु आवश्यकता पड़ने पर संसद को समाप्त
करने का अधिकार रखता है.
जनवादी कोरिया की राजनीतिक व्यवस्था
में ऐसे विशेषाधिकार या तंत्र का कोई अस्तित्व नहीं है. वे वास्तविक लोकतंत्र,
जो बहुसंख्यक जनता की इच्छा पर
आधारित हैं.
कॉमरेड किम जंग उन की तुलना किसी
सम्राट से करना केवल मूर्खतापूर्ण ही नहीं बल्कि पूरी तरह असत्य भी है.
कॉमरेड किम जंग उन के पास कोई निजी
संपत्ति अथवा व्यक्तिगत संपदा नहीं है. अपने सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन हेतु जिन
भवनों और सुविधाओं का वे उपयोग करते हैं, वे सभी राज्य की संपत्ति हैं, अर्थात वे जनवादी कोरिया की
संपत्ति हैं.
यदि इसकी तुलना ब्रिटिश राजशाही से
करें, तो स्थिति बिल्कुल भिन्न दिखाई देती
है.
ब्रिटेन के नागरिक अपने करों (Taxes)
से राजपरिवार के जीवन-यापन और उसके
रखरखाव का खर्च वहन करते हैं, चाहे
उन्होंने इसके लिए अपनी सहमति दी हो या नहीं.
उदाहरण के लिए, केवल बकिंघम पैलेस—जो ब्रिटिश राजशाही का आधिकारिक निवास है—में:
- 755
कमरे,
- राजपरिवार और अतिथियों के लिए 52 शयनकक्ष,
- कर्मचारियों के लिए 188 शयनकक्ष,
- 92 कार्यालय,
- तथा 78 स्नानघर हैं.
यह विशाल महल और उसके विस्तृत उद्यान
राजा के आधिकारिक निवासों में से केवल एक हैं, जिनका पूरा खर्च करदाताओं के धन से चलता है.
इसकी लागत कितनी है?
मार्च 2020 से मार्च 2021 के बीच केवल एक वर्ष में ब्रिटिश राजपरिवार पर करदाताओं के लगभग
85.9 मिलियन पाउंड खर्च हुए. यह 2019 की तुलना में लगभग 3.5 मिलियन
पाउंड अधिक था.
यह भी उल्लेखनीय है कि किसी राजशाही
में राष्ट्राध्यक्ष
(Head of State) का पद चुनाव द्वारा निर्धारित नहीं
होता.
इसके विपरीत, जनवादी कोरिया की राजनीतिक व्यवस्था में ऐसे अनेक तंत्र और
व्यवस्थाएँ हैं जो राजशाही की कार्यप्रणाली के बिल्कुल विपरीत हैं.
राजशाही में सत्ता और संपत्ति दोनों
एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित होती हैं.
जनवादी कोरिया में ऐसा नहीं है.
जनवादी कोरिया में कॉमरेड किम जंग उन को नेता चुने जाने का
कारण यह है कि वहाँ का समाज किम परिवार के प्रति गहरा सम्मान रखता है तथा कोरिया
की मुक्ति में उनके योगदान को स्वीकार करता है. इसी सम्मान की अभिव्यक्ति के रूप
में उन्हें राष्ट्राध्यक्ष के रूप में चुना गया और उन पर विश्वास व्यक्त किया गया.
यही वह तथ्य है जिसे संशोधनवादी (Revisionist)
और साम्राज्यवाद समर्थक प्रचारक (Imperialist
"Shouters") या तो समझ नहीं सकते अथवा समझना नहीं
चाहते.
ऐसे लोग स्वीकार ही नहीं कर सकते कि
पूरा समाज इतना अनुशासित तथा एकमत भी हो सकता है.
इसके अतिरिक्त किम परिवार को सत्ता
की वैधता (Legitimacy) उनके
रक्त बलिदान से प्राप्त हुई है, जो
उन्होंने कोरिया की मुक्ति और जनवादी कोरिया के निर्माण के संघर्ष में दिया.
कॉमरेड किम इल संग के भाई तथा किम
परिवार के अन्य सदस्य जापानी कब्जाधारियों द्वारा केवल इसलिए मार दिए गए थे
क्योंकि कॉमरेड किम इल संग राष्ट्रीय और सामाजिक मुक्ति के संघर्ष में जनता का
नेतृत्व कर रहे थे.
इस प्रकार, पूँजीपति समर्थक मीडिया जैसा दावा करता है कि
राज्य कॉमरेड किम जंग उन के प्रति उत्तरदायी है, वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है.
वास्तव में कॉमरेड किम जंग उन स्वयं
जनसरकार (People's Government) के
प्रति उत्तरदायी हैं.
यदि वे वर्कर्स पार्टी (Workers'
Party) के नेता तथा मेहनतकश जनता के
प्रतिनिधि के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करने में असफल होते, अथवा ऐसे निर्देश देते जो श्रमिक जनता की
आवश्यकताओं और हितों के अनुरूप न होते, तो उन्हें तत्काल उनके पद से हटा दिया जाता.
ऐसी स्थिति के लिए कोरिया के वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया (Workers'
Party of Korea) के पास पहले से ही योजनाएँ और
संस्थागत व्यवस्थाएँ मौजूद हैं.
कॉमरेड किम जंग उन के पास कोई विशेष
"आपातकालीन शक्तियाँ" (Emergency
Powers) भी नहीं हैं जिनके माध्यम से वे
राजनीतिक सत्ता का केंद्रीकरण कर सकें, सरकारी निर्णयों को वीटो कर सकें अथवा जनता की सरकार के आदेशों को
रद्द कर सकें.
यहाँ पर एक बात जोड़नी जरुरी है कि
1994 में कॉमरेड किम इल संग की मृत्यु के
बाद जनता का एक बड़ा भाग चाहता था कि कॉमरेड किम जंग इल राष्ट्राध्यक्ष बनें.
किन्तु उन्होंने इस प्रस्ताव को
अस्वीकार कर दिया और कहा—"मुझे
किसी मानद पद, उपाधि या आधिकारिक पद की आवश्यकता
नहीं है. जनता का समर्थन ही मेरे लिए पर्याप्त है."
जिस बात पर पश्चिमी दुनिया तथा उसके
संशयवादी विश्वास नहीं कर पाते, वह यह
है कि कॉमरेड किम जंग उन का चुनाव लाखों श्रमिकों, किसानों तथा श्रमिक बुद्धिजीवियों (Working Intelligentsia) के गठबंधन द्वारा स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक
चुनावों में राष्ट्र के योग्य प्रतिनिधि के रूप में किया गया. वे कॉमरेड किम जंग
इल के बेटे हैं तथा ऐसे क्रांतिकारी परिवार से आते हैं जिसने न केवल जनवादी कोरिया
को जापानी तथा अमेरिकी कब्जे से मुक्त
कराया बल्कि समाजवादी परिवर्तन की निरंतरता को भी बनाए रखा तथा ऐसा समाजवादी राज्य
निर्मित किया जो कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नहीं बल्कि समस्त जनता के लिए समृद्धि
का राज्य है.
यह राष्ट्रीय एकता का ऐसा उदाहरण है
जो अन्यत्र बहुत कम देखने को मिलता है और संभवतः इसी कारण पश्चिम समर्थक देशों के
लिए इस पर विश्वास करना कठिन है.
समाजवाद के निर्माण के लिए अनुशासित
श्रम तथा अपने नेता के साथ सामंजस्यपूर्ण एकता उसी व्यवस्था की विशेषता है.
इस प्रकार यह नेतृत्व तथाकथित "व्यक्ति
पूजा" फैलाने के लिए नहीं है, बल्कि
समाजवाद के निर्माण की प्रक्रिया में पार्टी के नेतृत्व का अनुसरण करने के लिए है.
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि एशियाई
मानसिकता यूरोपीय मानसिकता से भिन्न होती है.
एशिया के सामाजिक तथा राजनीतिक
संरचनाओं में नेता की भूमिका ऐतिहासिक रूप से गहराई से समाहित है.
अब आइए यूरोप में व्यक्ति पूजा के
उदाहरण के रूप में ग्रेट ब्रिटेन की राजशाही व्यवस्था पर विचार करें.
जैसा कि स्पष्ट होता है, पश्चिम की शब्दावली के अनुसार स्वयं को
"लोकतांत्रिक" कहने वाले अनेक देशों में वास्तव में व्यक्ति पूजा
विद्यमान है.
ऐसे देशों में सबसे प्रमुख उदाहरण ग्रेट ब्रिटेन है.
राजकीय गान (National Anthem)
और राज्य के आदर्श वाक्य (Motto)
में सम्राट के लिंग (Gender) के अनुसार होने वाले हालिया परिवर्तनों को यदि
अलग भी रख दें, तो भी वर्तमान शासक (जो व्यवहार में
केवल राज्य का प्रतिनिधि है) के संबंध में अनेक बातें अत्यंत विचित्र प्रतीत होती
हैं.
हाल तक महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के
पूरे 70 वर्षों के शासनकाल में उनका चित्र उन लगभग सभी स्थानों
पर दिखाई देने लगा जहाँ इससे पहले किसी भी पूर्व शासक का चित्र कभी नहीं लगाया गया
था.
उसकी तस्वीरें—
- पासपोर्टों पर,
- सरकारी वर्दियों पर,
- डाक टिकटों पर,
- बैंक नोटों पर,
- तथा यहाँ तक कि सिक्कों पर भी अंकित की गईं.
यह अत्यंत आश्चर्यजनक है कि एक ऐसा
देश जो स्वयं को लोकतांत्रिक कहता है और व्यवहार में लगभग गणतांत्रिक व्यवस्था
जैसा संचालित होता है (यद्यपि औपचारिक रूप से नहीं), उसकी सरकारी संस्थाएँ किसी एक व्यक्ति के सम्मान और महिमामंडन की इतनी
व्यापक व्यवस्था स्थापित करें.
ग्रेट ब्रिटेन का अपना राष्ट्रीय
प्रतीक-चिह्न (Coat of Arms) है. तो
फिर सरकारी वर्दियों या पासपोर्टों पर उसी राष्ट्रीय प्रतीक-चिह्न का उपयोग क्यों
नहीं किया जाता?
अधिकांश देशों में बैंक नोटों पर
विभिन्न ऐतिहासिक शासकों अथवा राष्ट्रीय महान व्यक्तियों के चित्र अंकित होते हैं,
न कि केवल एक ही व्यक्ति का, जैसा कि ग्रेट ब्रिटेन में देखा जाता है.
इसके विपरीत, ग्रेट ब्रिटेन में हाल के वर्षों तक सभी बैंक
नोटों पर केवल महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय का ही चित्र अंकित रहा.
सभी बैंक नोटों तथा यहाँ तक कि सभी
सिक्कों पर भी केवल एक ही शासक का चित्र अंकित करना, और उसकी मृत्यु के बाद उन नोटों और सिक्कों को प्रचलन से हटाने की
योजना बनाना, व्यक्ति पूजा का एक स्पष्ट उदाहरण है
तथा इसमें अनेक व्यावहारिक कमियाँ भी हैं.
यह स्वार्थपूर्ण भी है, क्योंकि ग्रेट ब्रिटेन के इतिहास में अनेक अन्य
शासक भी हुए हैं. फिर भी मुद्रा पर केवल वर्तमान शासक को ही स्थान दिया जाता है.
इसके कारण विभिन्न मूल्यवर्ग (Denominations)
के बैंक नोटों की पहचान करना भी कठिन
हो जाता है.
उदाहरण के लिए, पोलैंड में अलग-अलग शासकों अथवा ऐतिहासिक
व्यक्तियों के चित्र होने से लोगों के लिए विभिन्न बैंक नोटों की पहचान करना अधिक
आसान होता है—विशेषकर 10 और 100
ज़्लॉटी के नोट, जिनका रंग समान (हरा) है.
इसके अतिरिक्त, पोलैंड में लोग प्रायः बैंक नोटों को उनके ऊपर
अंकित ऐतिहासिक शासकों के नाम से भी पहचान लेते हैं.
ग्रेट ब्रिटेन में ऐसा करना संभव
नहीं है, क्योंकि लगभग सभी नोटों पर एक ही
व्यक्ति का चित्र होता है.
महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के चित्र
वाले बैंक नोटों और सिक्कों को प्रचलन से हटाना भी उचित नहीं है.
यद्यपि वर्तमान में उन्हें पूरी तरह
वापस नहीं लिया गया है, फिर भी
अधिकारियों की योजना भविष्य में ऐसा करने की है.
क्या केवल इसलिए कि महारानी अब जीवित
नहीं हैं, उसकी तस्वीर वाली मुद्रा का उपयोग
अनुचित हो गया? ये बैंक नोट और सिक्के स्वयं
ब्रिटेन के इतिहास का हिस्सा हैं.
उन पर उनके जारी होने का वर्ष भी
अंकित है, जिससे यह आसानी से जाना जा सकता है
कि उस समय कौन-सा शासक शासन कर रहा था.
तो फिर इन्हें राजा चार्ल्स तृतीय (पूर्व में प्रिंस चार्ल्स) के चित्र वाली नई
मुद्रा के साथ प्रचलन में बने रहने क्यों नहीं दिया जा सकता?
आख़िरकार सिक्के बहुत धीरे-धीरे
घिसते हैं और कई दशकों तक उपयोग में रह सकते हैं.
इसी प्रकार अनेक महत्वपूर्ण
संस्थानों—विशेषकर शैक्षणिक संस्थानों तथा खेल परिसरों—के नाम प्रत्येक नए शासक के
अनुसार बदलते रहना भी अत्यंत विचित्र है.
यदि कोई विश्वविद्यालय, स्टेडियम या अन्य सार्वजनिक संस्था किसी पूर्व
सम्राट के नाम पर है, तो
केवल उसकी मृत्यु हो जाने के कारण उसका नाम बदलने की आवश्यकता क्या है?
ब्रिटिश व्यवस्था में लगभग प्रत्येक
सिक्के, बैंक नोट तथा अधिकांश डाक टिकटों पर
केवल एक ही शासक का चित्र अंकित किया जाता है.
इस चित्र को लगभग राष्ट्रीय प्रतीक
के समान महत्व दिया जाता है.
इसी प्रकार अनेक शैक्षणिक, खेल एवं सार्वजनिक संस्थानों का नाम भी एक ही
व्यक्ति के नाम पर रखा जाता है.यही व्यवहार दर्शाता है कि व्यक्ति पूजा व्यवहार
में किस प्रकार कार्य करती है.
ब्रिटिश समाज द्वारा अधिकांश
महत्वपूर्ण खेल, शिक्षा तथा सांस्कृतिक संस्थानों का
नाम भी एक ही व्यक्ति के नाम पर रखना इस बात का प्रमाण है कि वह स्वयं व्यक्ति
पूजा का पालन करता है, जबकि
वही समाज जनवादी कोरिया पर व्यक्ति पूजा का आरोप लगाता है.यह स्पष्ट रूप से पाखंड (Hypocrisy) है.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि अतीत
के ब्रिटिश शासकों के चित्र कभी सरकारी वर्दियों, डाक टिकटों, बैंक
नोटों अथवा पासपोर्टों पर व्यापक रूप से प्रदर्शित नहीं किए जाते थे.
1952 से
पहले प्रचलन में रहने वाले सिक्के और पासपोर्ट आज की तुलना में कहीं अधिक साधारण
थे तथा उन पर जटिल चित्र छापना अत्यधिक महँगा भी था. उस समय शासकों के चित्र मुख्यतः स्मारक (Collector's)
सिक्कों पर ही दिखाई देते थे.
1960 के दशक
से ग्रेट ब्रिटेन (तथा वे अनेक देश जो औपचारिक रूप से ब्रिटिश राजतंत्र के अधीन
हैं) ने व्यवहार में महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय की छवि को लगभग राष्ट्रीय प्रतीक (Coat
of Arms) के समान महत्व देना प्रारंभ कर दिया.
उस समय से यह अपेक्षा की जाने लगी कि
उसका चित्र—
- सभी डाक टिकटों पर,
- मुद्रा पर,
- सरकारी वर्दियों पर,
- तथा यहाँ तक कि पासपोर्टों पर भी दिखाई दे.
बैंक नोटों और डाक टिकटों के मामले
में तो उनकी तस्वीर लगभग हर स्थान पर अनिवार्य हो गई.
यदि किसी बैंक नोट या डाक टिकट पर
अन्य चित्र भी होता, तब भी
उसके साथ महारानी का चित्र अवश्य शामिल किया जाता.
इससे भी अधिक उल्लेखनीय बात यह है कि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड जैसे देशों को भी इस परंपरा में शामिल किया गया.
ये देश यथासंभव स्वतंत्र नीतियाँ
अपनाते हैं, फिर भी ब्रिटिश विरासत के सम्मान के
नाम पर वे भी उसी प्रकार शासक की छवि को व्यापक रूप से अपनाते हैं. यह भी व्यक्ति पूजा का ही एक रूप है.
अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में
महारानी एलिज़ाबेथ
द्वितीय की छवि
का ब्रिटिश राज्य द्वारा जारी लगभग प्रत्येक वस्तु पर सर्वव्यापी रूप से दिखाई
देना तथा लगभग सभी महत्वपूर्ण सरकारी भवनों और संस्थानों का उनके संरक्षण (Patronage)
में होना व्यक्ति पूजा (Personality
Cult) का एक स्पष्ट लक्षण है.
उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम के दक्षिण-पश्चिम में स्थित समरसेट (Somerset) के टॉनटन (Taunton) नगर में बने नए अस्पताल परिसर का नाम "जुबिली बिल्डिंग (Jubilee Building)"
रखा गया है, जो राजपरिवार के किसी जयंती समारोह की स्मृति में
समर्पित है.
इसी प्रकार अस्पतालों के विभिन्न
विभागों के नाम भी "क्वीन
(Queen)" अथवा "डचेस (Duchess)" जैसे शाही उपाधियों पर रखे जाते हैं.
ग्रेट ब्रिटेन में व्यक्ति पूजा का
एक अन्य स्वरूप केवल महारानी तक सीमित नहीं है, बल्कि राजपरिवार (Royal Family) के अन्य सदस्यों की भी व्यापक प्रशंसा और महिमामंडन किया जाता है.
मीडिया और प्रचार के माध्यम से
उन्हें नायकों तथा समाज द्वारा अत्यधिक प्रिय व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया
जाता है.
एक समय इसका उदाहरण
"Harry and Meghan – The Love Story" नामक किताब थी .यह किताब ऐसी कहानियों से भरी हुई है जो न केवल उबाऊ
हैं, बल्कि अनेक मूर्खतापूर्ण बातों से भी
परिपूर्ण हैं.
इसमें शाही जीवन के आलीशान वातावरण,
गपशप, षड्यंत्र और ऐसे जीवन का वर्णन किया गया है जिसमें सामान्य नागरिकों
जैसी दैनिक चिंताओं का कोई स्थान नहीं है.
इसके अलावा "Prince
Harry – The Other One" भी एक
ऐसी ही किताब है जिसे "साहित्यिक कचरा" (Literary Trash) तक कहा गया .यह इतनी नीरस किताब है कि स्वयं अनेक
ब्रिटिश पाठकों ने भी इसे निरर्थक बताया.
इस किताब की अधिकांश समीक्षाओं में
यह कहा गया कि इसकी सामग्री मुख्यतः प्रिंस हैरी द्वारा अपनी माँ की मृत्यु के
आघात (Trauma) से उबरने के प्रयासों और उससे जुड़ी
व्यक्तिगत शिकायतों का वर्णन है.
जब राजा चार्ल्स तृतीय का राज्याभिषेक (Coronation) हुआ, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 100 मिलियन पाउंड थी और जिसका खर्च करदाताओं के धन से वहन किया गया, तब उसके कार्यस्थल पर व्यक्ति पूजा जैसी सामूहिक
मानसिकता (Collective Psychosis) देखने
को मिली. यहाँ तक कि ब्रिटेन के वृद्धाश्रमों (Nursing Homes) में रहने वाले सभी वृद्धों को टेलीविज़न के
सामने एकत्रित किया गया ताकि वे राज्याभिषेक समारोह देखें, उस पर चर्चा करें और उसकी प्रशंसा करें.
यही स्थिति महारानी एलिज़ाबेथ
द्वितीय के अंतिम संस्कार के समय भी देखने को मिली थी.जब पूरे ब्रिटेन में बड़ी
संख्या में लोग या तो स्वयं समारोह में उपस्थित हुए अथवा अपने घरों में टेलीविज़न
के सामने बैठकर नए सम्राट के राज्याभिषेक का उत्सव मनाते रहे.
लोग उस व्यवस्था का उत्सव मना रहे थे
जिसे वह "मध्य युग का अवशेष" (Relic of the Middle Ages) कहता है और जिसका अस्तित्व जनता के श्रम तथा करों
पर आधारित है.
इसे और कुछ नहीं बल्कि प्रचार (Propaganda)
के माध्यम से उत्पन्न की गई उच्च
स्तर की मूर्खता (High Degree of Stupidity) माना जाना चाहिए.
ग्रेट ब्रिटेन में व्यक्ति पूजा लगभग हर स्तर पर
विद्यमान है और यह केवल महारानी तक सीमित नहीं है, बल्कि तथाकथित "शाही
परिवार" (Royal Family) के
अन्य सदस्यों तक भी फैली हुई है.ब्रिटिश जनता को इस प्रकार के प्रचार से लगातार
प्रभावित किया जाता है कि राजशाही और शाही परिवार असाधारण गुणों तथा विशेष महत्व
के प्रतीक हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि वे सामान्य मनुष्य हैं तथा शाही परिवार
में भी अनेक विकृत विशेषताएँ मौजूद हैं.

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