जनवादी कोरिया की एकीकरण नीति में परिवर्तन की प्रक्रिया
जनवादी
कोरिया ने गत 22–23 मार्च को आयोजित सर्वोच्च
जनसभा (Supreme People's Assembly) के 15वें कार्यकाल के प्रथम अधिवेशन में संविधान संशोधन के
माध्यम से जनवादी कोरिया की
चौहद्दी को इस
प्रकार परिभाषित किया—
"उत्तर में चीनी जनवादी गणराज्य और रूसी संघ तथा दक्षिण
में कोरिया गणराज्य (दक्षिण कोरिया) से सटे हुए क्षेत्र तथा उसके आधार पर
निर्धारित प्रादेशिक जल और वायु क्षेत्र."
इसके माध्यम
से 26–30 दिसंबर 2023
को आयोजित कोरिया की
वर्कर्स पार्टी की केंद्रीय समिति के 8वें कार्यकाल के 9वें पूर्ण अधिवेशन में एकीकरण
(पुनर्एकीकरण) की नीति को समाप्त करने के बाद किए गए कानूनों, संस्थागत व्यवस्थाओं और
संगठनों के पुनर्गठन की प्रक्रिया फिलहाल पूर्ण हो गई.
अब तक जनवादी
कोरिया द्वारा एकीकरण नीति समाप्त करने की पृष्ठभूमि को लेकर अनेक प्रकार के
अनुमान लगाए जाते रहे हैं.
आइए, जनवादी कोरिया की एकीकरण नीति में आए परिवर्तनों के माध्यम से इस प्रश्न पर विचार करें.
संपूर्ण
कोरिया में आम चुनाव की योजना (1950 का दशक)
15 अगस्त 1945 को जापानी उपनिवेशवाद से मुक्ति के साथ ही
कोरियाई प्रायद्वीप विभाजित हो गया.
विशेष रूप
से मई 1948 में 38वें समानांतर (38th Parallel) के दक्षिण में पृथक
चुनावों के माध्यम से अलग सरकार की स्थापना होने पर जनवादी कोरिया ने पूरे कोरिया
में सामान्य चुनावों के माध्यम से एकीकरण का प्रस्ताव
रखा.
उसने सितंबर 1949,
7 जून 1950,
27 अप्रैल 1954,
तथा
26 अक्टूबर 1959
सहित अनेक
अवसरों पर लगातार संयुक्त चुनाव कराने का प्रस्ताव दिया.
विशेष रूप
से 27 अप्रैल 1954
को आयोजित जेनेवा
राजनीतिक सम्मेलन में उपप्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री कॉमरेड नाम इल ने विस्तृत प्रस्ताव रखा
कि—
- उत्तर और दक्षिण
समान संख्या में प्रतिनिधि चुनें,
- उनके द्वारा एक सर्व-कोरिया समिति का गठन किया जाए,
- तटस्थ राष्ट्रों की
पर्यवेक्षण समिति की निगरानी में पूरे कोरिया में आम चुनाव कराए जाएँ,
- और उसके आधार पर एक संयुक्त सरकार बनाई जाए.
उस समय
विभाजन हुए अधिक समय नहीं बीता था, इसलिए संभवतः जनवादी कोरिया का आकलन था कि सम्पूर्ण
कोरिया को एक सरकार और एक व्यवस्था के अंतर्गत पुनः एकीकृत किया जा सकता है.
यदि 1960
के दशक की
दक्षिण कोरियाई फ़िल्में देखी जाएँ, तो उनमें बोलचाल, चेहरे के भाव और व्यवहार
जनवादी कोरिया के लोगों से लगभग समान दिखाई देते हैं.
इसलिए कई
लोग उन्हें देखकर यह भी समझ बैठते हैं कि वे जनवादी कोरिया की फ़िल्में हैं.
इससे स्पष्ट होता है कि उस समय उत्तर और दक्षिण के बीच जीवन-शैली तथा सांस्कृतिक दूरी बहुत अधिक नहीं थी.
संक्रमणकालीन
संघीय व्यवस्था (1960 का दशक)
सिंगमान री
की सरकार केवल उत्तर की ओर बढ़कर एकीकरण (북진통일) की नीति पर ज़ोर देती
रही और उसने जनवादी कोरिया के संयुक्त चुनाव के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया.
इसके
परिणामस्वरूप 14 अगस्त 1960
को कॉमरेड किम
इल संग ने स्वतंत्रता दिवस की 15वीं वर्षगाँठ के अवसर पर
दिए गए भाषण में "उत्तर-दक्षिण संघीय व्यवस्था (북남연방제)"
का प्रस्ताव
रखा.
उनका तर्क
था कि यदि दक्षिण कोरियाई सरकार संयुक्त चुनाव स्वीकार नहीं कर सकती, तो कम-से-कम
संक्रमणकालीन व्यवस्था के रूप में संघीय प्रणाली अपनाई जाए.
उत्तर-दक्षिण
संघीय व्यवस्था का मुख्य विचार यह था कि—
दोनों
सरकारें अपनी-अपनी स्वतंत्र गतिविधियाँ जारी रखें, जबकि दोनों पक्षों के सरकारी प्रतिनिधियों से
मिलकर एक सर्वोच्च राष्ट्रीय समिति बनाई जाए, जो अर्थव्यवस्था और
संस्कृति के विकास का संयुक्त रूप से समन्वय करे.
उनका कहना
था कि यदि आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में आदान-प्रदान और सहयोग बढ़ेगा,
तो दोनों
पक्षों के बीच विश्वास पैदा होगा और उसके बाद संयुक्त चुनावों के माध्यम से
शांतिपूर्ण पुनर्एकीकरण संभव होगा.
इसके
अतिरिक्त उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा कि यदि दक्षिण कोरियाई सरकार संघीय व्यवस्था
भी स्वीकार नहीं कर सकती, तो कम-से-कम दोनों पक्षों के उद्योगपतियों के प्रतिनिधि
मिलकर एक आर्थिक समिति का गठन करें और आर्थिक
सहयोग की शुरुआत करें.
1950 के दशक के उत्तरार्ध तक दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था सिंगमान री
शासन की नीतियों के कारण गंभीर संकट में पहुँच चुकी थी.
जनता के
बढ़ते असंतोष की अनदेखी करते हुए उसकी सरकार ने सत्ता में बने रहने के लिए चुनावों
में धांधली की.
अंततः
1960 की 19
अप्रैल विद्रोह
के परिणामस्वरूप उसकी सरकार का पतन हो गया.
इसके विपरीत,
जनवादी
कोरिया समाजवादी व्यवस्था की ओर बढ़ रहा था और देशभर में सहकारी कृषि फार्म तथा
राज्य-स्वामित्व वाले उद्योग स्थापित होने लगे थे.
संघीय
व्यवस्था द्वारा एकीकरण (1970 के दशक से आगे)
23 जून 1973 को जनवादी कोरिया के राष्ट्रपति कॉमरेड किम इल संग ने चेकोस्लोवाकिया की कम्युनिस्ट पार्टी के
महासचिव कॉमरेड
गुस्ताव
हुसाक के सम्मान में आयोजित प्योंगयांग नगर की जनसभा में
"पितृभूमि के
पुनर्एकीकरण के पाँच सिद्धांत (조국통일 5대 방침)"
प्रस्तुत
किए.
इन पाँच
सिद्धांतों में चौथा सिद्धांत "कोर्यो संघीय गणराज्य (고려연방공화국)
द्वारा
एकीकरण की योजना" था.
इसके दो दिन
बाद, 25 जून 1973
को कोरिया
की वर्कर्स पार्टी की केंद्रीय समिति के पोलित ब्यूरो की विस्तारित बैठक में दिए
गए भाषण के माध्यम से कॉमरेड किम इल संग ने इस योजना की और अधिक विस्तार से व्याख्या की.
इस योजना और
पूर्व की उत्तर-दक्षिण संघीय व्यवस्था के बीच सबसे बड़ा अंतर
यह था कि इसमें "संयुक्त चुनावों तक पहुँचने के लिए संक्रमणकालीन
उपाय" जैसी अभिव्यक्ति समाप्त हो गई थी.
यद्यपि जनवादी
कोरिया अब भी संघीय व्यवस्था को पूर्ण एकीकरण नहीं मानता था, फिर भी पहले की तुलना
में संघीय चरण को कहीं अधिक महत्व दिया गया.
इसके बाद
10 अक्टूबर 1980
को जनवादी
कोरिया के राष्ट्रपति कॉमरेड किम इल संग ने कोरिया की वर्कर्स
पार्टी की छठी कांग्रेस में "कोर्यो लोकतांत्रिक संघीय गणराज्य (고려민주연방공화국)"
की स्थापना
का प्रस्ताव रखा.
इससे पहले
प्रस्तुत संघीय योजनाएँ पूर्ण एकीकरण तक पहुँचने के लिए केवल संक्रमणकालीन अथवा
मध्यवर्ती चरण मानी जाती थीं.
लेकिन इस नई
योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें संघीय व्यवस्था को ही
पूर्ण रूप से एकीकृत राष्ट्र का स्वरूप माना गया.
इस योजना के अनुसार संघीय सरकार राजनीति, रक्षातथा विदेश नीति का दायित्व संभालेगी, जबकि शेष प्रशासनिक कार्य उत्तर और दक्षिण की क्षेत्रीय सरकारें करेंगी.
1991 में कॉमरेड किम इल संग ने अपने नववर्ष संदेश में प्रस्ताव रखा कि
प्रारम्भिक चरण में क्षेत्रीय सरकारों को अधिक अधिकार दिए जाएँ और बाद में क्रमशः
केंद्रीय सरकार की भूमिका को मजबूत किया जाए.
अर्थात्
उन्होंने संघीय व्यवस्था को निम्न स्तर तथा उच्च स्तर—दो चरणों में विभाजित
किया.
इसी विचार
ने आगे चलकर 15 जून 2000
के
उत्तर-दक्षिण संयुक्त घोषणा-पत्र में निम्न स्तर की संघीय
व्यवस्था और संघ (Confederation) की समानताओं को आधार
बनाकर पुनर्एकीकरण की योजना का रूप लिया.
जनवादी कोरिया द्वारा संक्रमणकालीन संघीय व्यवस्था से आगे बढ़कर स्वयं संघीय व्यवस्था को ही एकीकरण मानने के पीछे एक प्रमुख कारण यह था कि उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक व्यवस्था तथा सामाजिक-जीवन और संस्कृति का अंतर अत्यधिक बढ़ चुका था.
दक्षिण
कोरिया ने 1970 के दशक में
भारी एवं रासायनिक उद्योगों को विकसित करते हुए, यद्यपि विकृत रूप में, पूँजीवादी व्यवस्था को
दृढ़ता से स्थापित किया.
बड़े-बड़े
औद्योगिक समूह (चेबोल) विकसित हुए और वे मुख्यतः अमेरिका-केंद्रित विदेशी पूँजी की
स्थानीय शाखाओं की भूमिका निभाने लगे.
फलस्वरूप
दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था संरचनात्मक रूप से अमेरिका की उपठेका (Subcontract)
अर्थव्यवस्था
बन गई.
1986 में प्रारम्भ हुए उरुग्वे दौर (Uruguay
Round) के बाद 1990
के दशक के
प्रारम्भ में दक्षिण कोरिया ने कृषि, बौद्धिक संपदा अधिकार तथा शेयर बाज़ार सहित
अनेक क्षेत्रों को विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया.
1997 के अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) संकट के बाद उसकी
अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह अमेरिकी प्रभाव में चली गई.
इसके बाद दक्षिण
कोरिया–अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के माध्यम से वह और अधिक अमेरिकी व्यवस्था पर
निर्भर हो गया.
आज दक्षिण कोरिया की बाह्य-निर्भरता (External Dependency) लगभग 100 प्रतिशत के आसपास है, जो अत्यंत उच्च मानी जाती है.
इसके विपरीत
जनवादी कोरिया ने समाजवादी व्यवस्था को और विकसित करते हुए राष्ट्रीय आत्मनिर्भर
अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई और दक्षिण कोरिया के बिल्कुल विपरीत मार्ग
पर चला.
इसके अलावा जनवादी कोरिया के आर्थिक
आँकड़ों की पूरी तरह पुष्टि नहीं की जा सकती, फिर भी विभिन्न अनुमानों के अनुसार
2023 में उसकी
बाह्य-निर्भरता लगभग 9 प्रतिशत आँकी जाती है.
इस प्रकार
उत्तर और दक्षिण की आर्थिक व्यवस्थाएँ—
- पूँजीवाद और
समाजवाद,
- बाह्य-निर्भर
अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था—
के रूप में
इतनी अलग हो गईं कि उनका पुनः एकीकरण अत्यंत कठिन स्तर तक पहुँच गया.
लेकिन इससे
भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि दोनों देशों के नागरिकों की
मानसिकता,
सामाजिक
चेतना और जीवन-संस्कृति में तीव्र परिवर्तन आ गया.
अमेरिका ने
दक्षिण कोरिया में अपनी सैन्य उपस्थिति (USFK) को स्थायी और सुरक्षित बनाए रखने के लिए
दक्षिण कोरिया को पूरी तरह एक अमेरिका-समर्थक राष्ट्र
के रूप में
विकसित किया. राजनीतिक जगत ने कोरिया-अमेरिका गठबंधन को एक पवित्र और अछूत
क्षेत्र के रूप में स्थापित किया तथा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून
(National Security Law) का उपयोग करके अमेरिका-विरोधी चेतना को पूरी तरह
समाप्त करने का प्रयास किया.
फलस्वरूप,
दक्षिण
कोरियाई समाज में अमेरिका को सबसे उन्नत देश मानकर उसकी अंधानुकरण करने वाली
संस्कृति मुख्यधारा बन गई. विद्यालयों में अमेरिकी महान व्यक्तियों की जीवनियाँ
पढ़ाई जाती हैं, सिनेमाघरों
और टेलीविजन पर अमेरिकी फ़िल्में और धारावाहिक दिखाए जाते हैं, भाषा और लेखन में भी
लगभग सब कुछ अंग्रेज़ी से भर गया है, और खाने-पीने की वस्तुएँ भी तेजी से अमेरिकी
भोजन में बदल गईं.
अमेरिका
द्वारा स्थापित प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म
(Protestantism) के अनुयायी अमेरिका
का राष्ट्रीय ध्वज (Stars and Stripes) लहराते हुए सार्वजनिक चौकों पर एकत्रित होते
हैं. साथ ही भौतिकवाद, रूप-सौंदर्य को सर्वोच्च मानने वाली संस्कृति,
अश्लील
संस्कृति, तथा भोग-विलास
एवं पतनशील संस्कृति व्यापक रूप से फैल गई.
ऐसी
परिस्थिति में दक्षिण कोरिया में कोरियाई पारंपरिक संस्कृति अपना स्थान खोती जा
रही है.
सरकार
पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण और विकास के लिए सहायता देने में उदासीन है और केवल हाल्यु (कोरियाई
लहर) को बढ़ावा देने में निवेश करती है. दक्षिण कोरिया में
कोरियाई पारंपरिक संस्कृति केवल लुप्त ही नहीं हो रही, बल्कि उसे तिरस्कार और
अस्वीकृति का विषय बना दिया गया है.
12 अप्रैल 2011 को हानबोक (पारंपरिक दक्षिण कोरियाई
पोशाक) डिज़ाइनर ली हे-सून को केवल इसलिए शिल्ला होटल
(Shilla Hotel) के बुफे
रेस्तराँ में प्रवेश से रोक दिया गया क्योंकि उन्होंने हानबोक पहन रखी थी.
उस समय होटल
कर्मचारी ने उनसे कहा:"हमारे होटल में ड्रेस कोड (पोशाक नियम) है. हानबोक पहनकर
प्रवेश नहीं किया जा सकता." आश्चर्यचकित ली हे-सून
ने पूछा कि हानबोक पहनने पर प्रतिबंध क्यों है. इस पर प्रबंधक ने उत्तर दिया"हानबोक एक खतरनाक पोशाक
है."
उसने आगे
कहा कि:"इसका आकार
बड़ा होता है और इससे अन्य लोगों को असुविधा हो सकती है."
वास्तव में,
उस समय शिला
होटल में हानबोक और
खेल-कूद के
वस्त्र (स्पोर्ट्सवियर) पहनकर प्रवेश करने पर प्रतिबंध था.
यह
आश्चर्यजनक है कि दक्षिण कोरिया के सबसे प्रतिष्ठित होटलों में गिने जाने वाले शिल्ला
होटल ने हानबोक पर प्रतिबंध लगाया था. इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि जापानी
पारंपरिक पोशाक किमोनो प्रतिबंधित नहीं थी.
दूसरी ओर,
अमेरिकी
संस्कृति के तीव्र प्रसार के साथ पारंपरिक सामुदायिक संस्कृति समाप्त होती गई और व्यक्तिवाद समाज में
स्थापित हो गया.
1990 के दशक में उभरी एक्स (X) पीढ़ी से प्रारंभ
होकर बाद में वाई (Y) पीढ़ी, एम (M) पीढ़ी, ज़ेड (Z) पीढ़ी आदि के साथ व्यक्तिवाद
लगातार और अधिक प्रबल होता गया.
"पड़ोसी ही सबसे बड़ा रिश्तेदार होता है" जैसी कहावत लगभग समाप्त
हो चुकी है. अब लोगों को अपने बगल वाले घर में कौन रहता है, यह भी पता नहीं होता,
और कई बार
किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद भी उसका शव लंबे समय तक वहीं पड़ा रहता है.
गली-मोहल्लों
में बच्चों के एक साथ खेलना लगभग समाप्त हो गया है. बचपन से ही अकेले वीडियो गेम
खेलना या मोबाइल फोन पर वीडियो देखना सामान्य संस्कृति बन गया है.
लोग सामाजिक
समस्याओं को भी व्यक्ति की व्यक्तिगत क्षमता का प्रश्न मानते हैं.
दक्षिण
कोरियाई समाज में जीवित रहने का मार्ग, व्यवस्था में सुधार करना या सामुदायिक
संस्कृति को पुनर्जीवित करना नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत क्षमता बढ़ाकर दूसरों से आगे
निकलना माना जाता है.
इसके विपरीत,
जनवादी
कोरिया ने "जूछे
(स्वावलंबन) और राष्ट्रीयता" पर बल देते हुए ऐसी
संस्कृति विकसित की जिसमें समाजवादी विषयवस्तु के साथ राष्ट्रीय
स्वरूप को जोड़ा गया.
जनवादी
कोरिया का कहना है कि जापानी उपनिवेश काल और कोरियाई युद्ध के दौरान जापान तथा अमेरिका ने कोरियाई
जनता का नरसंहार किया था, इसलिए वह दोनों देशों को शत्रु मानता है.
इसी कारण जनवादी
कोरिया के नागरिकों में अमेरिका-विरोधी तथा जापान-विरोधी भावनाएँ
अत्यंत प्रबल हैं.
सरकार ने
अमेरिका और जापान की संस्कृति के प्रवेश को पूरी तरह अवरुद्ध किया.
साथ ही उसने व्यक्तिवाद को अस्वीकार
कर सामूहिकता (Collectivism) को सुदृढ़ किया और पूरे समाज को
"एक बड़े
परिवार" के रूप में देखने की अवधारणा विकसित की.
इस प्रकार
उत्तर और दक्षिण कोरिया के नागरिकों की चेतना, भावनात्मक दृष्टिकोण तथा जीवन-संस्कृति के बीच की
दूरी अत्यधिक बढ़ चुकी है.
निस्संदेह,
उत्तर-दक्षिण
नागरिक आदान-प्रदान के दौरान जनवादी कोरियाई लोगों से मिलने वाले कुछ लोग यह कहते
हैं कि उन्हें एक ही राष्ट्र होने का भाव महसूस हुआ.
किन्तु एक
दृष्टि से यह संभवतः दक्षिण कोरिया में लंबे समय तक जनवादी कोरिया का दानवीकरण (demonization)
किए जाने की
प्रतिक्रिया भी हो सकती है.
लोग यह सोचकर मिले कि सामने वाला व्यक्ति मानो सींग वाला राक्षस होगा (आप विश्वास नहीं करेंगे 1990 के शुरुआती दौर तक दक्षिण कोरिया के स्कूली किताबों में जनवादी कोरिया के लोगों को इंसान नहीं बल्कि सींग वाला राक्षस बताया जाता था.), लेकिन जब उन्होंने देखा कि भाषा कुछ हद तक समान है और रूप-रंग भी मिलता-जुलता है, तब उन्हें राहत महसूस हुई.
एकीकरण
(पुनर्एकीकरण) नीति का परित्याग (2023~)
जनवादी
कोरिया ने 26–30 दिसंबर 2023
को आयोजित कोरिया की
वर्कर्स पार्टी की केंद्रीय समिति के 8वें कार्यकाल की 9वीं पूर्ण बैठक में यह
घोषित किया कि:
"उत्तर-दक्षिण संबंध अब एक ही जाति (सहजातीय) अथवा समान
राष्ट्रीय समुदाय के संबंध नहीं रहे, बल्कि दो शत्रुतापूर्ण राज्यों तथा युद्धरत
दो पक्षों के संबंध बन चुके हैं."
इसके साथ ही
उसने आधिकारिक रूप से एकीकरण की नीति को समाप्त कर दिया और
"दो-राज्य
सिद्धांत (2개 국가론)"
की घोषणा की.
यह केवल एक
घोषणा तक सीमित नहीं रहा. वास्तव में जनवादी कोरिया ने अपने सभी आधिकारिक
दस्तावेज़ों से निम्नलिखित शब्दों को हटा दिया—
- "हमारी जाति
(राष्ट्रीयता) (우리 민족)"
- "एकीकरण (통일)"
- "सामछनरी (삼천리)"
(तीन हजार कोस , री दूरी मापने
की पारंपरिक कोरियाई इकाई है)
- "आठ करोड़ कोरियाई
जनता (8천만 겨레)"
- "राष्ट्रीय महान
एकता (민족대단결)"
साथ ही एकीकरण से
संबंधित संस्थाओं को भी समाप्त कर दिया गया.
इसे लेकर
कुछ लोगों ने विश्लेषण किया कि इसका कारण मून जे इन तथा यून सक यल सरकारों की जनवादी
कोरिया-विरोधी नीतियाँ थीं. उनका अनुमान था कि यदि दक्षिण कोरिया में सरकार बदलती
है और जनवादी कोरिया के प्रति नीति बदलती है, तो जनवादी कोरिया पुनः अपनी एकीकरण नीति की
ओर लौट सकता है.
कुछ अन्य
लोगों ने यह भी तर्क दिया कि जनवादी कोरिया और दक्षिण कोरिया एक ही कोरियाई
जाति हैं; इसलिए यदि जनवादी कोरिया यह कह भी दे कि ऐसा नहीं है,
तो इससे
दोनों अलग-अलग जातियाँ नहीं बन जातीं.
किन्तु यदि जनवादी
कोरिया की एकीकरण नीति में हुए ऐतिहासिक परिवर्तनों को देखा जाए,
तो यह
प्रश्न इतना सरल नहीं है.
समय के साथ जनवादी
कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच केवल राजनीतिक व्यवस्था का अंतर ही नहीं, बल्कि जनता की
चेतना, भावनात्मक
दृष्टिकोण तथा जीवन-संस्कृति में भी अंतर लगातार
बढ़ता गया.
इसी के
अनुरूप जनवादी कोरिया की एकीकरण नीति भी बदलती गई—
- संपूर्ण कोरिया में
आम चुनाव (총선거)
से,
- संक्रमणकालीन संघीय
व्यवस्था (과도기 연방제)
तक,
- फिर संघीय व्यवस्था (연방제)
तक,
- और बाद में निम्न-स्तरीय संघीय व्यवस्था (낮은 단계 연방제)
तक.
इस प्रकार
उसकी नीति धीरे-धीरे एकल व्यवस्था और एकल राज्य की अवधारणा
से हटकर ऐसी दिशा में विकसित हुई, जिसमें वास्तविकता में दो राज्य
हों, किन्तु
कम-से-कम औपचारिक रूप से एक राज्य का स्वरूप बनाए रखा जाए.
यदि ऐसा है,
तो संभवतः जनवादी
कोरिया ने एकीकरण नीति इसलिए समाप्त की क्योंकि उसने यह निष्कर्ष निकाला कि अब जनवादी
कोरिया और दक्षिण कोरिया के नागरिकों के बीच जीवन-संस्कृति का अंतर
इतना अधिक हो चुका है कि उनके लिए एक साथ रहना कठिन हो गया है.

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