फिर से गरमाया जनवादी कोरिया का परमाणु मुद्दा
ईरान युद्ध
में पराजय के बाद अमेरिका की नजर जनवादी कोरिया पर
ईरान युद्ध
के युद्धविराम संबंधी समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding) के साथ अस्थायी रूप से
समाप्त होने के बाद, अमेरिका की रणनीतिक रुचि तेजी से जनवादी कोरिया की ओर
स्थानांतरित हो रही है.
19 तारीख को अमेरिकी कठपुतली दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति
ली जे म्यंग ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित
यूरोप यात्रा के परिणामों पर ब्रीफिंग के दौरान कहा:
“ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड
ट्रम्प ने जनवादी कोरिया के राज्य मामलों के अध्यक्ष किम जंग उन, के साथ ली गई तस्वीर को
सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए पहले खुद ही उसका उल्लेख किया. साथ ही उन्होंने कहा
कि अब जनवादी कोरिया के मुद्दे पर ध्यान देने का समय आ गया है.”
उसने यह भी
कहा कि ट्रम्प ने टिप्पणी की:
“यह अफसोस की
बात है कि जब जनवादी कोरिया ने वास्तव में परमाणु हथियार हासिल नहीं किए थे,
उस चरण में
कुछ संभव कदम उठाए जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका.”
और यह भी
जोड़ा कि:“ऐसा लगता है
कि वह इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इसका समाधान क्या हो सकता है.”
ली ने यह भी बताया कि जब उसने फ्रीज (Freeze) → कटौती (Reduction) → समाप्ति (Elimination) के चरणबद्ध दृष्टिकोण को समझाया, तो ट्रम्प ने उत्तर दिया कि वह इसपर विचार करेगा.
हालांकि
निष्कर्ष रूप में कहा जाए तो, अमेरिका का ध्यान जनवादी कोरिया की ओर जाने का अर्थ यह
नहीं है कि अमेरिका-जनवादी कोरिया वार्ता सफल होने की संभावना अधिक है.
इसका कारण
यह है कि अमेरिका जिस वार्ता की कल्पना करता है, उसका मुख्य एजेंडा ‘परमाणु निरस्त्रीकरण’ है.
जनवादी
कोरिया पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि परमाणु मुद्दा बातचीत का विषय नहीं हो सकता.
इसके अलावा,
जनवादी
कोरिया के पास अमेरिका के साथ जल्दबाजी में वार्ता करने के लिए कोई जल्दबाजी भी
नहीं है.
हालिया जनवादी
कोरिया-चीन शिखर सम्मेलन के माध्यम से रूस के बाद चीन भी वस्तुतः जनवादी कोरिया पर
लगाए गए प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करने की दिशा में शामिल हो गया है.
अमेरिका के प्रमुख मीडिया संस्थान तक जनवादी कोरिया को “वर्तमान दुनिया की सबसे आश्चर्यजनक आर्थिक सफलता की कहानी” बताने लगे हैं.
ऐसी
परिस्थिति में जनवादी कोरिया के लिए अपनी मौजूदा नीति छोड़कर परमाणु निरस्त्रीकरण
पर चर्चा स्वीकार करने का कोई कारण नहीं है, और यह स्थिति केवल चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाने
से भी नहीं बदलती.
अमेरिका भी
संभवतः इस वास्तविकता से अनभिज्ञ नहीं होगा.
यदि ऐसा है,
तो यह मानना
होगा कि अमेरिका द्वारा जनवादी कोरिया की ओर ध्यान मोड़ने के पीछे कोई अन्य
उद्देश्य है.
जून महीने
में अचानक तेज हुई परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग
हाल के समय
में जनवादी कोरिया के परमाणु मुद्दे के संबंध में एक उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई
देता है.
ट्रम्प ने
अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में जनवादी कोरिया को परमाणु हथियार संपन्न
राष्ट्र (Nuclear Power) कहा था और ऐसा प्रतीत हुआ था कि वह परमाणु निरस्त्रीकरण
की मांग से कुछ पीछे हट रहा है.
ली जे म्यंग ने भी पिछले 21 जनवरी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था: “क्या जनवादी कोरिया परमाणु हथियार छोड़ देगा?”
और आगे कहा: “यह एक अत्यंत स्पष्ट वास्तविकता है.”
जनवादी कोरिया द्वारा लगातार यह घोषणा किए जाने के परिणामस्वरूप कि“यदि परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की जाएगी तो कोई वार्ता नहीं होगी,”
अमेरिका और दक्षिण कोरिया भी एक समय कुछ पीछे हटते दिखाई दिए. लेकिन जून में प्रवेश करते ही माहौल अचानक बदल गया. हर दिशा से परमाणु निरस्त्रीकरण की मांगें उठने लगीं.
इसकी शुरुआत 14 मई को आयोजित चीन-अमेरिका शिखर सम्मेलन इस परिवर्तन का प्रारंभिक बिंदु बना.
बैठक के
तुरंत बाद व्हाइट हाउस द्वारा जारी आधिकारिक परिणामों में कोरियाई प्रायद्वीप का
कोई उल्लेख नहीं था.
लेकिन तीन दिन बाद, 17 मई को जारी फैक्ट शीट में यह वाक्य जोड़ा गया:“जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण के साझा लक्ष्य की पुष्टि की गई.”हालांकि चीन ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया.
जनवादी कोरिया की
वर्कर्स पार्टी की केंद्रीय समिति की सचिवालय प्रमुख कॉमरेड किमय जंग ने इसे “सिर्फ एक घिसी-पिटी झूठी सूचना फैलाने का खेल” बताते हुए अमेरिका पर फर्जी खबर फैलाने का आरोप लगाया.
इससे यह
संकेत मिलता है कि अमेरिका ने जानबूझकर चीन-अमेरिका शिखर सम्मेलन के परिणामों को
प्रस्तुत करते समय जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण के मुद्दे को प्रमुख
विवाद के रूप में उभारा.
जून में यह
अभियान वास्तव में उस समय तेज हुआ जब 8 जून को चीनी राष्ट्रपति
शी चिनफिंग ने फ्यंगयांग
का दौरा किया. ठीक उसी समय 8-9 जून को टोक्यो में अमेरिका-जापान विस्तारित प्रतिरोध
संवाद (EDD) आयोजित हुआ और एक संयुक्त बयान जारी हुआ“जनवादी कोरिया के पूर्ण
परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि की जाती है.”
बयान में यह भी कहा गया:“दोनों प्रतिनिधिमंडलों ने चीन द्वारा तेजी से और अपारदर्शी तरीके से किए जा रहे परमाणु हथियार विस्तार पर चर्चा की तथा रूस के उस दावे को अस्वीकार किया कि जनवादी कोरिया का परमाणु हथियार कार्यक्रम अब एक समाप्त हो चुका मुद्दा है.”यह बयान स्पष्ट रूप से जनवादी कोरिया-चीन-रूस सहयोग को लक्ष्य बनाता हुआ दिखाई दिया.
9 जून को वियना में आयोजित IAEA बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक में संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के प्रतिनिधि हावर्ड सोलोमन ने कहा:“हम जनवादी कोरिया की उकसाने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए दक्षिण कोरिया, जापान और अन्य देशों के साथ घनिष्ठ समन्वय कर रहे हैं तथा जनवादी कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रति समर्पित हैं.”
10 जून को दक्षिण कोरिया–यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के संयुक्त बयान में निम्नलिखित बातों की पुनः पुष्टि की गई “कोरियाई प्रायद्वीप का पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण किया जाए” साथ ही यह भी कहा गया:
“जनवादी कोरिया को परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के अंतर्गत किसी भी परिस्थिति में परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती.” इस पर आलोचना हुई कि ली जे म्यंग द्वारा यूरोप यात्रा के दौरान अनावश्यक रूप से परमाणु निरस्त्रीकरण का मुद्दा उठाना जनवादी कोरिया को उकसाने जैसा था और उसकी पूर्व नीति से भी मेल नहीं खाता था.
11 जून को सियोल में आयोजित छठी अमेरिका- दक्षिण
कोरिया-अमेरिका NCG बैठक के बयान में, पिछले वर्ष दिसंबर में
आयोजित पाँचवीं बैठक के विपरीत, जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण के लक्ष्य का
स्पष्ट उल्लेख किया गया.
12 जून को टोक्यो में आयोजित अमेरिका-जापान-दक्षिण कोरिया बैठक में तीनों देशों के विदेश अधिकारियों ने पुनः पुष्टि की कि “कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के लक्ष्य और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को लागू करने के प्रयास जारी रहेंगे.”
17 जून को फ्रांस में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन में जारी भूराजनीतिक मुद्दों पर G7 नेताओं के बयानमें कोरियाई प्रायद्वीप का मुद्दा प्रमुखता से शामिल किया गया, जबकि यह मूल एजेंडा में नहीं था. इस बयान में कहा गया “जनवादी कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की पुनः पुष्टि की जाती है.”इ स बयान पर आमंत्रित राष्ट्राध्यक्ष के रूप में ली जे म्यंग का भी नाम शामिल था.
18 जून को अमेरिकी विदेश विभाग के उप सहायक सचिव डेविड
विलेज़ोल ने वाशिंगटन डी.सी. में आयोजित “दक्षिण कोरिया-अमेरिका
रणनीतिक उद्योग एवं सुरक्षा फोरम” में कहा:“मेरा मानना है कि जनवादी कोरिया का मुद्दा
हमारी नीति प्राथमिकताओं की सूची में बहुत ऊँचे स्थान पर है.”
उसने आगे कहा:“किसी भी प्रशासन की तरह, हमारे प्रशासन में भी जनवादी
कोरिया पर होने वाली चर्चाओं का केंद्र परमाणु निरस्त्रीकरण ही है.”
परमाणु
निरस्त्रीकरण की मांग का वास्तविक स्वरूप: क्या यह युद्ध की पूर्वपीठिका है?
इन
घटनाक्रमों में कुछ ऐसे बयान भी हैं जिन्हें नियमित और सामान्य कूटनीतिक वक्तव्य
माना जा सकता है.
लेकिन ऐसे
अनेक उदाहरण हैं जहाँ असंबंधित संदर्भों में भी परमाणु निरस्त्रीकरण पर विशेष जोर
दिया गया.
इन्हें केवल
संयोग मानना कठिन है.
यह अमेरिका
द्वारा इस मुद्दे को जानबूझकर एक प्रमुख विवाद के रूप में स्थापित करने की योजना
का परिणाम प्रतीत होता है.
विशेष रूप
से ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम का समय चीन-अमेरिका शिखर
सम्मेलन तथा जनवादी कोरिया-चीन शिखर सम्मेलन से सीधा जुड़ा हुआ है.
संभव है कि
अमेरिका ने चीन के माध्यम से अमेरिका-जनवादी कोरिया शिखर वार्ता कराने का प्रयास
किया हो और उसमें असफल रहा हो.
यह भी संभव
है कि अमेरिका ने यह निष्कर्ष निकाला हो कि जनवादी कोरिया और चीन के बीच फूट डालने
के लिए अमेरिका-जनवादी कोरिया वार्ता का उपयोग करना अब संभव नहीं है.
इसके
अतिरिक्त, जनवादी
कोरिया-चीन शिखर सम्मेलन के बाद दोनों देशों के संबंध और अधिक रणनीतिक रूप से
घनिष्ठ हो गए, जिससे
अमेरिका द्वारा कल्पित कोरियाई प्रायद्वीप और ताइवान युद्ध की रणनीति प्रभावित हो
सकती थी.
अमेरिका
द्वारा परमाणु निरस्त्रीकरण को मुद्दा बनाने के तीन प्रभाव
पहला,
जनवादी
कोरिया प्रतिक्रिया स्वरूप विरोध करेगा और संवाद की संभावनाएँ पूरी तरह समाप्त हो
जाएँगी.
दूसरा,
दक्षिण
कोरिया, जापान और
यूरोप जैसे सहयोगियों(गुलामों पढ़ें) को जनवादी कोरिया विरोधी मोर्चे में संगठित
किया जा सकेगा.
तीसरा,
जनवादी
कोरिया के संवाद से इनकार करने को आधार बनाकर अमेरिका द्वारा जनवादी कोरिया के
खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराने का तर्क तैयार किया जा सकता है.
अमेरिका
केवल परमाणु कार्यक्रम के संदेह के आधार पर ही ईरान पर आक्रमण कर चुका है.
इसलिए यह
अनुमान कि अमेरिका परमाणु निरस्त्रीकरण से इनकार को आक्रमण का बहाना बना सकता है,
कोई
अतिशयोक्ति नहीं है.
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि जितनी अधिक गंभीरता से अमेरिका जनवादी कोरिया के परमाणु हथियारों को समाप्त करने का प्रयास करेगा, उतना ही क्षेत्रीय हित और सुरक्षा खतरे में पड़ सकते हैं. इसीलिए अब समय आ गया है कि जनवादी कोरिया के ‘परमाणु निरस्त्रीकरण फ्रेम’ से बाहर निकला जाए.
अमेरिका की
गतिविधियों पर निकटता से नजर रखते हुए तथा परमाणु निरस्त्रीकरण संबंधी विवादों में
बहने के बजाय शांत और संतुलित निर्णय क्षमता बनाए रखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक
हो गया है.

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