अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा एक और युद्ध की तैयारी
हाल में जेवियर
ब्रूनसन (Xavier Brunson), जो दक्षिण
कोरिया में अमेरिकी सेना का कमांडर है, उनकी
गतिविधियों को देखकर बहुत से लोग ताइवान युद्ध की संभावना को लेकर चिंतित हैं. कहा
जा रहा है कि ईरान युद्ध अमेरिका की योजना के अनुसार नहीं चल रहा, इसलिए अमेरिका ताइवान युद्ध भड़काने की कोशिश कर
सकता है.
इसके विपरीत, कोरियाई प्रायद्वीप पर युद्ध, अर्थात
अमेरिका द्वारा जनवादी कोरिया के खिलाफ युद्ध शुरू करने की संभावना पर लगभग कोई
चर्चा नहीं हो रही है. यदि ध्यान से देखें तो कोरिया में अमेरिकी सेना कमांडर की
गतिविधियों को कोरियाई युद्ध से भी जोड़ा जा सकता है. लेकिन फिलहाल कोरियाई युद्ध
की चेतावनी देने वाले लोग लगभग नहीं हैं.
ताइवान युद्ध के संकेत के रूप में
जिस बहुराष्ट्रीय संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘बालिकातान’ का उल्लेख किया जाता है,
उस पर नज़र डालें. 20 अप्रैल से 8 मई तक
फिलीपींस क्षेत्र में आयोजित यह अभ्यास मूल रूप से अमेरिका और फिलीपींस का संयुक्त
अभ्यास था, लेकिन बाद में इसमें ऑस्ट्रेलिया,
न्यूज़ीलैंड और फ्रांस शामिल होने लगे, और इस वर्ष जापान तथा कनाडा भी शामिल हुए. दक्षिण
कोरिया पर्यवेक्षक देश के रूप में शामिल हुआ. हाल ही में दक्षिण कोरिया में रोटेशन
के आधार पर तैनात अमेरिकी सेना की दूसरी स्ट्राइकर ब्रिगेड के कुछ सैनिकों की भागीदारी
भी सामने आई है. इससे प्रतीत होता है कि अमेरिका ताइवान युद्ध में इन देशों तथा
दक्षिण कोरिया को शामिल करेगा. चीन का सामना करने के लिए बड़े
लेकिन यदि ताइवान युद्ध शुरू हो जाए
तो जनवादी कोरिया क्या करेगा?
वर्तमान में जनवादी कोरिया और चीन के
बीच “मैत्री, सहयोग एवं पारस्परिक सहायता संधि”
लागू है. संधि के अनुच्छेद 2 के
अनुसार, “यदि संधि के किसी एक पक्ष पर किसी एक
देश या कई देशों के गठबंधन द्वारा सशस्त्र आक्रमण किया जाता है और युद्ध की स्थिति
उत्पन्न होती है, तो दूसरा पक्ष अपनी पूरी शक्ति से
बिना देरी के सैन्य एवं अन्य सहायता प्रदान करेगा.”
इसलिए यदि अमेरिका-नेतृत्व वाली
संयुक्त सेना चीन पर हमला करती है, तो जनवादी
कोरिया निश्चित रूप से युद्ध में शामिल होगा.
यदि ताइवान चीन को उकसाकर युद्ध शुरू
कराए और युद्ध केवल ताइवान में हो, चीन की
मुख्यभूमि पर नहीं, तब क्या होगा?
फिर भी जनवादी कोरिया युद्ध में
शामिल होगा. क्योंकि चीन और ताइवान को अलग-अलग देश नहीं, बल्कि एक ही देश माना जाता है; इसलिए ताइवान को भी चीन का हिस्सा माना जा सकता है. अर्थात जनवादी
कोरिया की दृष्टि में चीन की भूमि पर युद्ध हो या ताइवान की भूमि पर, दोनों में कोई अंतर नहीं है.
यह स्थिति कुर्स्क में सैनिक भेजने
वाली परिस्थिति से अलग है. जनवादी कोरिया ने यूक्रेन युद्ध के दौरान लगातार रूस का
समर्थन किया, लेकिन कुर्स्क युद्ध शुरू होने तक
उसने सीधे भाग नहीं लिया. क्योंकि युद्ध केवल यूक्रेन की भूमि पर चल रहा था और रूस
पर सीधा हमला नहीं हुआ था, इसलिए
हस्तक्षेप की शर्त पूरी नहीं हुई थी. लेकिन जैसे ही यूक्रेन ने रूस के कुर्स्क
क्षेत्र पर हमला किया, जनवादी कोरिया ने तुरंत सैनिक भेज
दिए.
यदि ताइवान युद्ध शुरू होता है,
तो चाहे वह कहीं भी और किसी भी रूप में हो,
जनवादी कोरिया के शामिल होने की संभावना को ध्यान
में रखते हुए अमेरिका युद्ध की तैयारी कर रहा होगा. इस प्रकार ताइवान युद्ध और
कोरियाई युद्ध अलग-अलग नहीं, बल्कि
एक ही युद्ध क्षेत्र में होने वाला एक संयुक्त युद्ध बन जाएगा. वास्तव में अमेरिका
के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि ताइवान युद्ध या कोरियाई युद्ध में से कोई एक
पहले शुरू होता है, तो दूसरा स्वतः शुरू हो जाएगा.
बेशक, अमेरिका यह प्रयास भी कर रहा है कि जनवादी कोरिया युद्ध में शामिल न
हो. यह उसी तरह है जैसे अतीत में अमेरिका ने चीन और वियतनाम के बीच विभाजन और
टकराव पैदा किया था. इसके कारण अमेरिका सुनिश्चित कर सका कि ताइवान युद्ध होने पर
भी वियतनाम चीन की ओर से शामिल न हो. इसी प्रकार अमेरिका जनवादी कोरिया के साथ भी
ऐसा करना चाहता है. वर्तमान में डोनाल्ड ट्रम्प जनवादी कोरिया के साथ शिखर वार्ता
कराने के लिए जिस तरह प्रयास कर रहा है, उसका
कारण भी यही माना जा रहा है. वास्तव में 2018 की जनवादी कोरिया-अमेरिका शिखर बैठक का उद्देश्य भी चीन और जनवादी
कोरिया के संबंधों में दूरी पैदा करना था.
लेकिन जनवादी कोरिया अमेरिका की इस
रणनीति को समझता है और उसके जाल में नहीं फंस रहा. यही कारण है कि जनवादी कोरिया
अभी ट्रंप के प्रस्तावों पर ध्यान भी नहीं दे रहा.
यदि अमेरिका को लगे कि जनवादी कोरिया
उसकी विभाजन नीति के प्रभाव में आकर वियतनाम की तरह चीन के पक्ष में नहीं जाएगा,
तो वह केवल ताइवान युद्ध की तैयारी करेगा. लेकिन
यदि उसे लगे कि जनवादी कोरिया चीन के साथ खड़ा होगा, तो वह ताइवान युद्ध को छोड़ने के बजाय ताइवान और कोरियाई प्रायद्वीप
दोनों पर एक साथ युद्ध की तैयारी करेगा.
वर्तमान स्थिति को देखें तो अमेरिका
की विभाजन रणनीति विफल होती दिखाई देती है. अर्थात, ऐसा ताइवान युद्ध जिसमें जनवादी कोरिया शामिल न हो, संभव नहीं है. इसलिए अमेरिका कोरियाई युद्ध की भी
तैयारी करेगा. इसका स्वरूप ऐसा नहीं होगा कि अमेरिका ताइवान युद्ध शुरू करे और बाद
में जनवादी कोरिया के हस्तक्षेप से कोरियाई युद्ध फैल जाए, बल्कि अमेरिका ताइवान और कोरियाई प्रायद्वीप दोनों में एक साथ युद्ध
शुरू कर सकता है. क्योंकि उसे लगता है कि पूर्व-आक्रमण सबसे प्रभावी रणनीति है.
इसलिए यदि हम ताइवान युद्ध की
संभावना देखते हैं, तो हमें कोरियाई युद्ध की संभावना भी
देखनी चाहिए.
लगातार जारी युद्ध अभ्यास
अमेरिका अभी भी जनवादी कोरिया के
खिलाफ युद्ध की तैयारी लगातार कर रहा है.
9 से 19 मार्च तक आयोजित अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास “फ्रीडम
शील्ड” इसका प्रमुख उदाहरण है. इसके अलावा पूरे वर्ष लगभग बिना रुके युद्ध अभ्यास
जारी रहते हैं. 2026 की पहली अमेरिका-दक्षिण कोरिया मरीन
संयुक्त सैन्य कवायद (KMEP), 30 मार्च
से 3 अप्रैल तक चला CWMD-TF का जनवादी कोरिया घुसपैठ अभ्यास, 10 से 24 अप्रैल
तक ग्वांग्जू वायुसेना अड्डे पर आयोजित “फ्रीडम फ्लैग” हवाई अभ्यास, तथा 11 से 14
मई तक पूर्वी सागर में आयोजित संयुक्त नौसैनिक
अभ्यास जैसे अनेक सैन्य अभ्यास किए गए.
केवल अमेरिका-दक्षिण कोरिया अभ्यास
ही नहीं, बल्कि 23 मार्च से 3 अप्रैल तक अमेरिका, जापान और नीदरलैंड द्वारा पूर्वी सागर में
संयुक्त हवाई अभ्यास भी किया गया. 6 से 10
अप्रैल तक दक्षिण कोरिया, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया का संयुक्त बचाव प्रशिक्षण (SALVEX) भी आयोजित हुआ.
9 मार्च को अमेरिकी मरीन विशेष बल
“एंग्लिको” ने यनफ्यंग द्वीप और फेकन्यॉन्ग द्वीप में जनवादी कोरिया पर हमले के
लिए लक्ष्य निर्देशित करने और बमबारी कराने का अभ्यास किया. एंग्लिको एक अत्यंत
प्रशिक्षित इकाई है, जो दुश्मन क्षेत्र के पास घुसकर
लक्ष्य की पुष्टि करती है और फिर लड़ाकू विमानों एवं युद्धपोतों से हमला करवाती है.
ये सभी अभ्यास किसी भी समय कोरियाई
युद्ध छेड़ने की पूरी तैयारी के संकेत माने जाते हैं.
अमेरिका तर्कसंगत नहीं है
बहुत से लोग ताइवान युद्ध की संभावना
की बात करते हैं, लेकिन यह मानते हैं कि कोरियाई युद्ध
नहीं होगा. इसका कारण जनवादी कोरिया की परमाणु प्रतिरोध क्षमता है. माना जाता है
कि यदि अमेरिका कोरियाई युद्ध शुरू करेगा तो जनवादी कोरिया अमेरिका की मुख्यभूमि
पर परमाणु मिसाइल दाग देगा, इसलिए
अमेरिका युद्ध नहीं करेगा. वास्तव में यह एक सामान्य और तार्किक सोच है.
लेकिन हाल की घटनाओं को देखें तो पता
चलता है कि दुनिया हमेशा सामान्य तर्क के अनुसार नहीं चलती.
24 फरवरी 2022 से ठीक पहले तक अधिकांश लोग मानते थे कि यूक्रेन में पूर्ण पैमाने का
युद्ध नहीं होगा. 99 प्रतिशत लोग कहते थे कि “21वीं सदी में भला पूर्ण युद्ध कैसे हो सकता है?”
विशेषज्ञों ने भी कई तर्क देकर कहा था कि पूर्ण
युद्ध की संभावना नहीं है और अंततः यूक्रेन तथा पश्चिमी देश रूस की मांगें मान
लेंगे. वास्तव में विशेषज्ञों के तर्क बहुत तार्किक थे. लेकिन अंततः पूर्ण युद्ध
शुरू हो गया.
ईरान युद्ध भी ऐसा ही है. बहुत से
लोगों ने कहा कि अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ पूर्ण युद्ध शुरू करना पागलपन होगा.
विशेषज्ञों ने कई कारण दिए कि अमेरिका ईरान के खिलाफ पूर्ण युद्ध नहीं कर सकता.
लेकिन अंततः अमेरिका ने युद्ध शुरू कर दिया. लोग कहते हैं कि युद्ध के माध्यम से
अमेरिका अपने लक्ष्य कभी प्राप्त नहीं कर पाएगा, बल्कि यह उसके पतन को और तेज करेगा; इसलिए इस युद्ध को “पागल युद्ध” कहा जा रहा है.
इस प्रकार अमेरिका न तो सामान्य है
और न ही तर्कसंगत.
The New York Times ने 7
अप्रैल की रिपोर्ट “ट्रंप ने अमेरिका को ईरान के
साथ युद्ध की ओर कैसे धकेला” में विस्तार से बताया कि कैसे ट्रंप ने कई सलाहकारों
के विरोध के बावजूद युद्ध का निर्णय लिया. युद्ध की तीव्र इच्छा रखने वाले ट्रंप
ने अव्यावहारिक सैन्य योजनाओं को भी सफल मानते हुए युद्ध आगे बढ़ाया. अमेरिका ऐसी
स्थिति में पहुंच चुका है जहाँ वह तार्किक और सामान्य निर्णय लेने में सक्षम नहीं
है.
अमेरिका पहले भी ऐसा था, लेकिन अब वह युद्ध के बिना और भी अधिक अस्तित्व में
नहीं रह सकता. ट्रंप ने सत्ता में आते ही यूक्रेन युद्ध समाप्त करने की बात की थी,
लेकिन युद्ध अनिश्चितकाल तक खिंच रहा है. ईरान
युद्ध को भी जल्दी समाप्त करने की बात हुई, लेकिन वह भी अब तक जारी है. अब अमेरिका की बातों पर कोई आसानी से
विश्वास नहीं करता.
यदि इसी स्थिति में नवंबर में
मध्यावधि चुनाव हुए, तो ट्रंप की भारी हार लगभग निश्चित
मानी जा रही है. इसके बाद कांग्रेस उन पर महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर सकती है.
इसलिए ट्रंप किसी भी तरह मध्यावधि चुनाव जीतना चाहता है या फिर चुनाव टालना चाहता
है. इसके लिए सबसे पहले जो उपाय सोचा जा सकता है, वह युद्ध है.
लेकिन अब ईरान युद्ध पर्याप्त नहीं
है. ईरान युद्ध में निर्णायक जीत संभव नहीं दिखती, और नवंबर तक इसे खींचने से चुनावी हार ही मिलेगी. इसलिए ईरान युद्ध को
ढकने के लिए एक नए युद्ध की आवश्यकता होगी. ऐसा युद्ध, जिसके कारण मध्यावधि चुनाव तक टाले जा सकें. अभी क्यूबा पर आक्रमण की
चर्चाएँ भी हो रही हैं, लेकिन उससे चुनाव टल पाएंगे या नहीं,
यह स्पष्ट नहीं है. संभवतः ट्रंप ताइवान और
कोरियाई प्रायद्वीप दोनों पर युद्ध की योजना बना रहा होगा.

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