विश्व की तथाकथित पांचवी बड़ी सैन्य ताकत की हकीकत
क्या दक्षिण कोरिया की सैन्य शक्ति जनवादी
कोरिया पर भारी है?
दक्षिण कोरियाई सरकार अक्सर दावा
करती है कि उसकी सैन्य शक्ति विश्व में पाँचवें स्थान पर है. यह भी कहा जाता है कि उसके पास अत्यंत
शक्तिशाली पारंपरिक हथियार हैं.
हालाँकि आधुनिक युद्ध पारंपरिक
हथियारों पर आधारित हो सकते हैं, लेकिन परमाणु हथियार युद्ध के परिणाम को
निर्णायक रूप से प्रभावित करने वाली शक्ति बन चुके हैं.
लेकिन दक्षिण कोरिया के पास परमाणु
हथियार नहीं हैं. यद्यपि वह अमेरिका की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (Nuclear Deterrence ) पर निर्भर है, परंतु
इन हथियारों के संचालन का अधिकार दक्षिण कोरिया के पास नहीं है. यदि अमेरिका किसी
भी समय परमाणु सुरक्षा प्रदान करने से इनकार कर दे, तो दक्षिण कोरिया के पास कोई विकल्प नहीं रहेगा.
इसके विपरीत जनवादी कोरिया के पास स्वयं के परमाणु हथियार हैं.
लंबे समय तक जनवादी कोरिया के परमाणु अस्त्रों से इनकार करने वाला अमेरिका अब
व्यवहारिक रूप से उसे परमाणु हथियार संपन्न देश के रूप में स्वीकार करने लगा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा जनवादी कोरिया से संवाद करने की कोशिश करने का एक बड़ा कारण यह
भी है कि जनवादी कोरिया के पास ऐसे परमाणु हथियार हैं जो अमेरिका तक पहुँच सकते
हैं.
ऐसी स्थिति में दक्षिण कोरिया का यह
दावा करना कि उसकी सैन्य शक्ति पाँचवें स्थान पर है और उसी के आधार पर परमाणु
हथियार संपन्न जनवादी कोरिया के विरुद्ध सैन्य अभ्यास करना तर्कसंगत प्रतीत नहीं
होता.
साथ ही यह भी प्रश्न उठता है कि क्या
दक्षिण कोरिया की रक्षा शक्ति वास्तव में इतनी उच्च स्तर की है.
4 अक्टूबर
2022 को जब जनवादी कोरिया ने ह्वासंग-12 बैलिस्टिक मिसाइल का प्रक्षेपण किया, तब दक्षिण कोरियाई सेना ने उसी दिन कांगनुंग क्षेत्र से ह्यूनमु-2C बैलिस्टिक मिसाइल दागी. लेकिन मिसाइल सामान्य मार्ग पर उड़ान भरने के बजाय पीछे की ओर
गिरकर कांगनुंग वायुसेना अड्डे के गोल्फ मैदान में जा गिरी. सौभाग्य से वह किसी
आवासीय क्षेत्र में नहीं गिरी.
इसी प्रकार 23 नवंबर 2010 को यनफ्यंग द्वीप पर जनवादी कोरिया की गोलाबारी के समय दक्षिण कोरियाई मरीन कोर के पास मौजूद छह
K-9 स्वचालित तोपों
में से दो खराब हो गईं और काम नहीं
कर सकीं. शेष चार में से भी एक तोप 12 मिनट तक खराब रहने के कारण प्रारंभिक जवाबी कार्रवाई केवल तीन तोपों
से ही करनी पड़ी. इसके अलावा काउंटर-बैटरी रडार में खराबी के कारण गलत स्थान पर हमला भी किया गया.
K-9 तोपों
में डिज़ाइन दोष और घटिया पुर्जों के कारण इंजन न चलना या प्रशिक्षण के दौरान
अचानक रुक जाना जैसी घटनाएँ भी लगातार सामने आती रही हैं.
ये दोनों उदाहरण स्पष्ट रूप से
दिखाते हैं कि दक्षिण कोरियाई सेना की प्रमुख सैन्य शक्ति वास्तव में किस स्थिति
में है.
इसलिए विश्व में पाँचवीं सैन्य शक्ति
होने का दावा केवल आत्मसंतोष (Self-delusion) ही है.
अमेरिका पर निर्भरता अधिक और सेना का
मनोबल कम
दक्षिण कोरिया अमेरिकी हथियार
प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर है. उन्नत हथियारों के आयात में अमेरिका को
प्राथमिकता देने के कारण यह स्थिति बनी है.
अमेरिकी सेना हथियार बेचते समय उनकी रख-रखाव और मरम्मत की प्रमुख तकनीक अपने नियंत्रण में रखती है. इसलिए
यदि अमेरिकी सहयोग न मिले तो दक्षिण कोरियाई सेना इन उन्नत हथियारों का उपयोग करना
भी कठिन हो जाएगा.
उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरियाई वायुसेना द्वारा उपयोग किए जा रहे
F-35A लड़ाकू विमानों में लॉकहीड मार्टिन कंपनी की स्वचालित सैन्य प्रणाली लगी है,
जो विमान की उड़ान जानकारी और तकनीकी
स्थिति को वास्तविक समय में अमेरिका और निर्माता कंपनी को भेजती है. यदि अमेरिका
इस डेटा कनेक्शन को बंद कर दे, तो
विमान के पुर्जों का परिवर्तन या मरम्मत संभव नहीं होगी.
अन्य अमेरिकी हथियार भी इसी प्रकार
तकनीकी सहायता, पुर्जों की आपूर्ति या सॉफ्टवेयर
अपडेट बंद होने पर बेकार हो सकते हैं.
यह आशंका भी व्यक्त की जाती है कि
अमेरिका के पास “किल स्विच” जैसी तकनीक हो सकती है, जिससे दूर से ही हथियारों को निष्क्रिय किया जा
सकता है.
अर्थात यदि अमेरिका चाहे तो दक्षिण
कोरिया के अमेरिकी हथियारों को कबाड़ में बदल सकता है.
2016 में
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था कि “यदि कोरियाई
प्रायद्वीप में युद्ध हो भी जाए तो अमेरिका हस्तक्षेप नहीं करेगा,” और उन्होंने दक्षिण कोरिया से अमेरिकी सैनिकों की
वापसी का भी उल्लेख किया था.
हाल ही में उन्होंने यह भी कहा कि
“दक्षिण कोरिया की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं दक्षिण कोरिया को उठानी चाहिए.”
यदि संयुक्त सैन्य अभ्यास के कारण
कोरियाई प्रायद्वीप में युद्ध छिड़ जाए और अमेरिका पीछे हट जाए या हथियार सहायता
बंद कर दे, तो दक्षिण कोरियाई सेना लगभग असहाय
स्थिति में पहुँच सकती है.
सैनिकों का मनोबल और सैन्य नेतृत्व
सैन्य शक्ति में हथियार महत्वपूर्ण
होते हैं, लेकिन सैनिकों का मनोबल और युद्ध क्षमता उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है.
दक्षिण कोरियाई सेना की स्थिति पर भी
प्रश्न उठते रहे हैं. सेना पर आधारित टीवी धारावाहिक जैसे “सिनब्यंग” और “D.P.” काफी लोकप्रिय हुए, जिनमें
सेना के भीतर होने वाले दुर्व्यवहार, उत्पीड़न और भगोड़े सैनिकों जैसी समस्याओं को दिखाया गया.
सैनिकों के बीच “मुख्य दुश्मन हमारे
अधिकारी हैं” जैसी कहावतें भी प्रचलित हैं, और आम लोग कभी-कभी सैनिकों को अपमानजनक शब्दों से पुकारते हैं. इससे
सेना का मनोबल स्वाभाविक रूप से प्रभावित होता है.
इसके अतिरिक्त वास्तविक युद्ध संचालन
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मध्य स्तर के अधिकारी (उप-अधिकारी) बड़ी संख्या में समय से पहले सेना
छोड़ रहे हैं. इसका कारण सामाजिक सम्मान की कमी और खराब सेवा-शर्तें हैं.
स्थिति इतनी गंभीर है कि कभी-कभी
टैंक प्रशिक्षण के लिए चालक न होने के कारण पड़ोसी इकाइयों से सैनिक उधार लेने
पड़ते हैं.
लगातार चलने वाले सैन्य अभ्यासों के
कारण सैनिकों पर शारीरिक और मानसिक दबाव बढ़ने की चिंता भी व्यक्त की जाती है.
इसके साथ ही पूर्व राष्ट्रपति यून सुक यल द्वारा लगाए गए आपातकाल के प्रभाव से सेना का मनोबल और गिरने की बात
भी कही जाती है.
ऐसी स्थिति में अमेरिका के साथ संयुक्त सैन्य
अभ्यासों को जारी रखना, जो
संभावित रूप से युद्ध को जन्म दे सकते हैं, पुनर्विचार योग्य प्रतीत होता है.
दक्षिण कोरियाई सेना के पास पूर्ण
कमान क्षमता नहीं
दक्षिण कोरिया की सेना के पास युद्धकालीन संचालन नियंत्रण (OPCON)
नहीं है. यह अधिकार अभी भी अमेरिकी
सेना के पास है.
14 जुलाई 1950
को कोरियाई युद्ध के दौरान
राष्ट्रपति री
सिंग मान की कठपुतली
सरकार ने युद्धकालीन और शांतिकालीन संचालन नियंत्रण जनरल डगलस मैकआर्थर को सौंप दिया था. बाद में 1978 में संयुक्त अमेरिका- दक्षिण कोरिया कमान की
स्थापना के बाद यह अधिकार उसी के कमांडर के पास चला गया.
इसके बाद दक्षिण कोरियाई सेना की
अमेरिकी सेना पर निर्भरता और बढ़ गई. परिणामस्वरूप स्वतंत्र सैन्य कमान और बड़े
पैमाने पर रसद संचालन में अमेरिका के बिना कार्य करना कठिन हो गया.
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि पहले
यह जांचना आवश्यक है कि क्या दक्षिण कोरियाई सेना के पास स्वतंत्र रूप से युद्ध
संचालन करने की पर्याप्त क्षमता है.
राष्ट्रीय रक्षा सुरक्षा मंच के शोधकर्ता शिन जंग उ ने 30 अक्टूबर 2018 को BBC
News को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि
“युद्धकालीन नियंत्रण वापस लेने के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम जनवादी
कोरिया के खिलाफ प्रभावी सैन्य अभियान चला सकते हैं. इस बारे में कई संदेह हैं.”
इसी प्रकार कोरियन कल्चर एंड सिक्योरिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट के किम म्यंग सू ने 11 जुलाई 2025 को एक
लेख में कहा कि यदि संचालन नियंत्रण अमेरिका से दक्षिण कोरिया को मिल भी जाए,
तो खुफिया और निगरानी क्षमता की कमी जैसी समस्याएँ मौजूद हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि यदि अमेरिका
संयुक्त कमान के बजाय दक्षिण कोरियाई कमान के तहत कार्य करने लगे, तो वह अपनी खुफिया संपत्तियों के उपयोग पर सीमाएँ
लगा सकता है.
इसका अर्थ यह है कि अमेरिकी सेना के
बिना दक्षिण कोरियाई सेना की कमान क्षमता सीमित हो सकती है.
इसी कारण दक्षिण कोरियाई सैन्य
नेतृत्व के भीतर भी युद्धकालीन नियंत्रण की वापसी का विरोध करने की आवाजें सुनाई
देती हैं.
कोरियाई युद्ध के समय क्षमता की कमी
के कारण जो नियंत्रण अमेरिका को सौंपा गया था, वह स्थिति बदली नहीं है और आज भी अमेरिकी उपनिवेश दक्षिण कोरिया की
सेना अमेरिका के भाड़े की सेना ही है .
इस भाड़े की सेना के पूर्व विशेष बल
कमांडर छन इन
बम ने अगस्त 2025 में दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि “यदि सेना
में कोई दुर्घटना हो जाए तो ब्रिगेड या डिवीजन कमांडर तक को जिम्मेदार ठहराया जाता
है. इसलिए जो अधिकारी दुर्घटना से बचते हैं, उन्हें ही अच्छा माना जाता है.”
यह कथन भी बताता है कि सेना की
नेतृत्व क्षमता क्यों कमजोर हो सकती है.
उसने यहाँ तक कह दिया कि “हमारी
सैन्य आधारभूत सुविधाओं, प्रशिक्षण,
मनोबल और नेतृत्व को देखते हुए दक्षिण कोरिया को विश्व की पाँचवीं सैन्य शक्ति कहना अतिशयोक्ति है.”

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