जनवादी कोरिया के परमाणु हथियार और विश्व समृद्धि की गारंटी
“जनवादी कोरिया के परमाणु हथियार
विश्व समृद्धि की गारंटी देते हैं”… रूस के विदेश मंत्री का दावा
“आधुनिक विश्व की समृद्धि सुनिश्चित
करने वाला मुख्य (मुझे पूरा विश्वास है कि यहाँ यह शब्द पूरी तरह उपयुक्त है) तत्व,
दुर्भाग्य से, जनवादी कोरिया का परमाणु हथियार होना है.”
11 फरवरी को रूस के विदेश मंत्री सर्गेई
लावरोव ने स्टेट ड्यूमा (निचले सदन) में प्रश्न-उत्तर सत्र के दौरान यह बात कही.
यह बयान केवल अलंकारिक अभिव्यक्ति नहीं था, बल्कि पश्चिम-केंद्रित विश्व व्यवस्था के पतन के करीब पहुँचने की
वास्तविकता का ठंडे दिमाग से किया गया विश्लेषण था.
यहाँ ‘समृद्धि’ का अर्थ पूंजीवादी
आर्थिक विकास या आर्थिक सूचकांक नहीं है. इसका अर्थ भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के
बीच बड़े युद्धों से बचना और स्थिर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने की स्थिति है.
“दुर्भाग्य से” शब्द जोड़ने का कारण
यह दर्शाना है कि यह संतुलन हिंसा के प्रतीक परमाणु हथियारों पर निर्भर है,
जो एक विरोधाभासी स्थिति है. जब तक अमेरिका और
उसके सहयोगी परमाणु एकाधिकार के माध्यम से विश्व पर प्रभुत्व स्थापित करने की
महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ते, तब तक जनवादी
कोरिया का परमाणु हथियार उस महत्वाकांक्षा को रोकने वाला अंतिम अवरोध बना रहेगा.
उनके शब्द पश्चिम द्वारा लंबे समय से नजरअंदाज किए जा रहे गैर-पश्चिमी देशों के
प्रतिरोध को स्वीकार करने की घोषणा के रूप में देखे जा सकते हैं.
लावरोव के बयान को समझने के लिए 1945
अगस्त में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए
अमेरिकी परमाणु बम से शुरुआत करनी होगी. उन बमों ने 2 लाख से अधिक नागरिकों की तत्काल मृत्यु कर दी. युद्ध समाप्त करने का
तर्क दिया गया, लेकिन वास्तविक उद्देश्य द्वितीय
विश्व युद्ध के प्रमुख शक्ति सोवियत संघ को नियंत्रित करना और एशिया में प्रभुत्व
स्थापित करना था.
इसके बाद 1968 में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) हुई, लेकिन यह अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस,
सोवियत संघ और चीन जैसे परमाणु शक्तियों के विशेष
अधिकार को स्थायी बनाने वाली असमान संधि थी. गैर-परमाणु देशों को परमाणु हथियार
छोड़ने पड़े, लेकिन परमाणु शक्तियों ने हथियार कम
करने की जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई नहीं.
आज भी दुनिया में लगभग 12,000
परमाणु वारहेड मौजूद हैं. इनमें लगभग 90% अमेरिका और रूस के पास हैं. अमेरिका के पास लगभग 5,200
और रूस के पास लगभग 5,500 परमाणु हथियार हैं. अनुमान के अनुसार जनवादी कोरिया के पास लगभग 50
परमाणु वारहेड हैं. संख्या के हिसाब से जनवादी
कोरिया महाशक्तियों की बराबरी नहीं कर सकता, लेकिन परमाणु हथियार का स्वभाव ऐसा है कि केवल एक हथियार भी बड़ा
प्रतिरोध पैदा कर सकता है.
लावरोव का जनवादी कोरिया के परमाणु
हथियारों का उल्लेख इसी संदर्भ में समझना चाहिए.
परमाणु हथियार नैतिक हथियार नहीं
बल्कि संरचनात्मक वास्तविकता हैं. जब अमेरिका परमाणु हथियारों का एकाधिकार रखता था,
तब दुनिया सुरक्षित नहीं थी. बल्कि अमेरिका ने
परमाणु श्रेष्ठता के आधार पर कई सैन्य हस्तक्षेप किए—1950 का कोरियाई युद्ध, 1965 का
वियतनाम युद्ध, 1991 का खाड़ी युद्ध, 2003 का इराक युद्ध और 2011 का लीबिया युद्ध. परमाणु हथियारों ने युद्ध को नहीं रोका, बल्कि परमाणु एकाधिकार ने आक्रमण को संभव बनाया.
इराक के सद्दाम हुसैन ने 1990
के दशक के बाद परमाणु कार्यक्रम रोक दिया और
अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण स्वीकार किया. इसके बावजूद 2003 में अमेरिका ने ‘जनसंहारक हथियार’ के झूठे आरोप लगाकर इराक पर हमला
किया. युद्ध के बाद ऐसे हथियार नहीं मिले, लेकिन
नागरिक मौतों का अनुमान लाखों तक पहुँचा.
लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी ने 2003
में परमाणु कार्यक्रम छोड़ दिया और पश्चिम से
समझौता किया, लेकिन 2011 में नाटो हमले के दौरान उनकी हत्या कर दी गई. परमाणु हथियार छोड़ने
वाले देशों का परिणाम बार-बार समान रहा—सार्वभौमिकता का नुकसान, शासन व्यवस्था का पतन और सामाजिक विनाश.
जनवादी कोरिया इन सभी घटनाओं का
प्रत्यक्ष साक्षी रहा है. 1950 से तीन
वर्षों तक चले युद्ध में अमेरिका ने जनवादी कोरिया पर व्यापक बमबारी की, जिसमें लगभग 30 लाख नागरिक मारे गए. नेपाम बम और अंधाधुंध क्षेत्रीय बमबारी (Carpet Bombing) से अधिकांश शहर नष्ट हो गए. जनवादी कोरिया का परमाणु कार्यक्रम इसी
ऐतिहासिक आघात और अमेरिका की परमाणु धमकियों की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित हुआ.
जुलाई 2017 में ह्वासंग-14 अंतरमहाद्वीपीय
बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण एक निर्णायक मोड़ था. इसने अमेरिकी मुख्य भूमि पर हमले
की क्षमता साबित की और अमेरिका की एकतरफा सैन्य धमकी के संतुलन को बदल दिया. इसके
बाद अमेरिका के ‘पूर्व-आक्रमण विकल्प’ की व्यवहारिकता कम हो गई. परमाणु संतुलन
बनने के बाद जनवादी कोरिया के खिलाफ खुले सैन्य खतरे कम हो गए और अमेरिकी
राष्ट्रपति ने बातचीत शुरू की तथा दो शिखर सम्मेलन आयोजित हुए.
जनवादी कोरिया के परमाणु हथियार
विश्व समृद्धि सुनिश्चित करते हैं—इसका अर्थ यह नहीं कि जनवादी कोरिया दुनिया की
रक्षा करता है. इसका अर्थ यह है कि साम्राज्यवादी एकतरफा हिंसा को संरचनात्मक रूप
से सीमित किया जाता है.
अमेरिका के पास दुनिया भर में लगभग 750
विदेशी सैन्य अड्डे हैं और 2024 में उसका सैन्य खर्च लगभग 960 अरब डॉलर था, जो वैश्विक सैन्य खर्च का लगभग 37% है. जनवादी कोरिया के परमाणु हथियार इस विशाल सैन्य तंत्र को स्वतंत्र
रूप से कार्य करने से रोकते हैं. आर्थिक दृष्टि से देखा जाए तो जनवादी कोरिया का
परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी वार्षिक सैन्य बजट का बहुत छोटा हिस्सा है, लेकिन सीमित परमाणु हथियार भी विशाल सैन्य
व्यवस्था को संतुलित कर सकते हैं.
यदि जनवादी कोरिया परमाणु हथियार
छोड़ देता है तो कोरियाई प्रायद्वीप फिर अमेरिकी रणनीतिक सैन्य अड्डा बन सकता है.
चीन और रूस को घेरने के लिए अमेरिकी सैन्य तैनाती बढ़ेगी और पूर्वोत्तर एशिया नया
सैन्य मोर्चा बन सकता है. यह क्षेत्र विश्व सेमीकंडक्टर उत्पादन का लगभग 70%
और इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी व दुर्लभ खनिज आपूर्ति
का प्रमुख केंद्र है. इसलिए इस क्षेत्र की अस्थिरता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को
प्रभावित कर सकती है.
जनवादी कोरिया का परमाणु कार्यक्रम
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को भी मजबूत करता है. लावरोव द्वारा “दुर्भाग्य से”
कहने का अर्थ है कि परमाणु हथियार रहित शांति आदर्श है, लेकिन साम्राज्यवाद के अस्तित्व में यह संभव नहीं है. अंतरराष्ट्रीय
कानून कमजोर देशों की रक्षा नहीं कर पाता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ महाशक्तियों
के वीटो के सामने असहाय हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जनवादी कोरिया पर
प्रतिबंध लगाती है, लेकिन अमेरिकी युद्ध अपराधों पर चुप
रहती है. इस व्यवस्था में छोटे देशों के लिए आत्म-रक्षा ही अस्तित्व का साधन बनती
है.
जनवादी कोरिया रूस और चीन के साथ
रणनीतिक सहयोग के माध्यम से गैर-पश्चिमी व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है. ईरान,
वेनेजुएला और अफ्रीका के कुछ देशों का उदाहरण यह
बताता है कि वैश्विक राजनीति में नैतिकता नहीं बल्कि शक्ति संतुलन निर्णायक होता
है.
अंततः लावरोव का कथन यह संकेत देता
है कि जनवादी कोरिया के परमाणु हथियार युद्ध शुरू करने का साधन नहीं बल्कि
साम्राज्यवादी युद्ध योजनाओं को रोकने का माध्यम हैं. वे शांति की गारंटी नहीं
देते, लेकिन आक्रमण को कठिन बना देते हैं.
यह आदर्श दुनिया नहीं, बल्कि विनाश को नियंत्रित रखने वाली
दुनिया की संभावना प्रस्तुत करते हैं. पश्चिम द्वारा बताए जाने वाले ‘नियम’ और
‘अंतरराष्ट्रीय कानून’ वास्तव में शक्ति राजनीति को दर्शाते हैं, और जनवादी कोरिया के परमाणु हथियार इसी
वास्तविकता का प्रतीक हैं.

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