जनवादी कोरिया-अमेरिका वार्ता असंभव है!

 

अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने 26 अगस्त 2026 को जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण के लक्ष्य के बारे में दक्षिण कोरियाई मीडिया के एक सवाल के जवाब में कहा, “अमेरिका जनवादी कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए लगातार प्रतिबद्ध है.” यह पिछले 19 अगस्त के एक पत्रकार के इस सवाल से अलग रुख है कि क्या जनवादी कोरिया का परमाणु निरस्त्रीकरण अभी भी अमेरिका का लक्ष्य है. उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने “मैं उस बारे में बात नहीं करना चाहता” कहकर सवाल को टाल दिया था.

जनवादी कोरिया ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अमेरिका परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग करता रहेगा, तब तक वह बातचीत नहीं कर सकता. इसलिए इस स्थिति में जनवादी कोरिया-अमेरिका वार्ता असंभव है.

ट्रंप द्वारा जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण का उल्लेख किए बिना आगे बढ़ जाने का अर्थ जनवादी कोरिया को यह संदेश देना था कि, ‘मैंने अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास को भी कम कर दिया और उसे समय से पहले समाप्त कर दिया, और परमाणु निरस्त्रीकरण की बात भी नहीं करूंगा, इसलिए अब मिलते हैं.’ लेकिन जनवादी कोरिया ने अभ्यास को कम करने या समय से पहले समाप्त करने की बजाय पूरे अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास को ही शत्रुतापूर्ण कार्रवाई के रूप में परिभाषित किया और कहा कि “इस पर टिप्पणी करना भी बेकार है.” अर्थात ‘उल्ची फ्रीडम शील्ड’ के नाम पर तारीखें कम करके अभ्यास किया जाए, सैन्य गतिशील अभ्यासों की संख्या घटाई जाए, या अमेरिका और दक्षिण कोरिया अलग-अलग अभ्यास करें—किसी भी स्थिति में जनवादी कोरिया इसे अपने लिए शत्रुतापूर्ण नीति मानता है और इसलिए जनवादी कोरिया-अमेरिका वार्ता नहीं हो सकती.

इसी तरह, यदि ट्रंप परमाणु निरस्त्रीकरण का उल्लेख नहीं करता, लेकिन अमेरिकी विदेश विभाग या सरकार में कोई अन्य व्यक्ति जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग करता है, तो इसका अर्थ यही होगा कि अमेरिकी सरकार अभी भी जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण को आगे बढ़ा रही है. इसलिए जनवादी कोरिया बातचीत से इनकार करेगा.

इस बार यह साबित हो गया कि ट्रंप चाहता है कि जनवादी कोरिया और अमेरिका बातचीत करें,लेकिन अमेरिका परमाणु निरस्त्रीकरण की नीति छोड़ने और अमेरिका- दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास बंद करने जैसे दो प्रमुख मुद्दों पर अपनी नीति में बदलाव नहीं कर सकता. इसका अर्थ है कि अमेरिका जनवादी कोरिया के प्रति अपनी शत्रुतापूर्ण नीति को छोड़ना नहीं चाहता.

यदि ट्रंप स्पष्ट रूप से यह कहता है कि ‘हम जनवादी कोरिया से परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग नहीं करेंगे’ और ‘अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास को स्थायी रूप से बंद करेंगे’, तथा व्हाइट हाउस, विदेश विभाग और युद्ध विभाग सभी एक ही रुख अपनाकर इसे लागू करें, तो क्या होगा? ट्रंप के हटाए जाने की संभावना सबसे अधिक होगी. उसे राजनीतिक रूप से पूरी तरह खत्म किया जा सकता है, उसकी हत्या हो सकती है, एप्स्टीन कांड सामने आ सकता है और उसे इस्तीफा देना पड़ सकता है, या रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सांसद ट्रंप से मुंह मोड़कर उसके खिलाफ महाभियोग चला सकते हैं. तरीके कई हो सकते हैं. ट्रंप स्वयं भी इसे अच्छी तरह जानता होंगा. इसलिए वह इन सबका जोखिम उठाकर जनवादी कोरिया के प्रति शत्रुतापूर्ण नीति को पूरी तरह वापस लेने के बारे में नहीं सोचेगा.अमेरिका नामक देश भी ऐसी स्थिति में नहीं है.

इसलिए ट्रंप संभवतः अभी 2018 और 2019 में सिंगापुर तथा वियतनाम के हनोई में हुई शिखर वार्ताओं के स्तर की बातचीत करना चाहता होगा. उस समय ट्रंप के आदेश पर अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास बंद किया गया था, लेकिन मूल एजेंडा कोरियाई प्रायद्वीप का परमाणु निरस्त्रीकरण बनाम जनवादी कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को हटाना था, इसलिए यह कोई बड़ी समस्या नहीं बनी.अमेरिका ने अपनी मांगों को मूल एजेंडा बनाकर वार्ता की थी, इसलिए वह संयुक्त सैन्य अभ्यास बंद करने के बावजूद इसे अपनी जीत की प्रक्रिया मान सकता था.

ट्रंप अभी जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण और अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास रोकने के संबंध में अस्पष्ट रुख अपना रहा है. इसका अर्थ है, ‘इतना कर दिया है, अब जनवादी कोरिया को भी इसे स्वीकार कर लेना चाहिए.’

लेकिन जनवादी कोरिया का ऐसा करने का बिल्कुल कोई इरादा नहीं है. केवल वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो 2018 और 2019 की तुलना में जनवादी कोरिया आज कहीं अधिक अनुकूल स्थिति में है. उस समय की तुलना में उसने अधिक परमाणु हथियार जमा कर लिए हैं और मिसाइलों सहित अत्याधुनिक हथियारों का स्तर भी बढ़ा है. चीन और रूस के साथ उसके संबंध भी और अधिक घनिष्ठ हुए हैं तथा वे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक स्वर में बोलते हैं. साथ ही जनवादी कोरिया पर लगे प्रतिबंध भी वस्तुतः निष्प्रभावी हो गए हैं. और भले ही जनवादी कोरिया पर प्रतिबंध जारी रहें, उसने कई दशकों तक उन्हें झेलते हुए आर्थिक विकास किया है, इसलिए प्रतिबंध हटाना अब उसके लिए प्रोत्साहन के रूप में प्रभावी नहीं है.

2018 और 2019 के जनवादी कोरिया-अमेरिका शिखर सम्मेलनों में जनवादी कोरिया ने प्रतिबंध हटाने और परमाणु निरस्त्रीकरण की अदला-बदली के तरीके से बातचीत की थी, इसे भी केवल दिखाई देने वाली घटनाओं के आधार पर समझना उचित नहीं है. उस समय जनवादी कोरिया वास्तव में प्रतिबंध हटवाने के लिए अपने परमाणु हथियार छोड़ना चाहता था, ऐसा नहीं था.बल्कि यह समझना चाहिए कि वह परमाणु शक्ति को और मजबूत तथा वैध बनाने सहित अपने परमाणु हथियार रखने की स्थिति को और अधिक मजबूत करने की प्रक्रिया में था.

2019 के हनोई सम्मेलन के बिना किसी समझौते के समाप्त होने के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय में जो धारणा बनी, उसे देखें तो जनवादी कोरिया की रणनीति स्पष्ट हो जाती है. बहुत से लोगों की नजर में जनवादी कोरिया यंगब्यन परमाणु सुविधाओं को पूरी तरह नष्ट करने तक के लिए तैयार होकर ईमानदारी से परमाणु निरस्त्रीकरण की दिशा में आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन अमेरिका ने नागरिक क्षेत्र से संबंधित प्रतिबंध हटाने को स्वीकार नहीं किया और जिद पर अड़ा रहा, जिसके कारण समझौता विफल हो गया. इसलिए जनवादी कोरिया का परमाणु निरस्त्रीकरण न चाहने वाला देश अमेरिका था. जनवादी कोरिया शिखर वार्ता के माध्यम से यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखाना चाहता था और अमेरिका इसी जाल में फंस गया.

उस समय अनेक मीडिया संस्थानों और विशेषज्ञों ने विश्लेषण किया था कि जनवादी कोरिया और अमेरिका के बीच समझौते का मसौदा तैयार हो चुका था, लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने हस्तक्षेप करके अतिरिक्त मांगें रखीं, जिसके कारण समझौता टूट गया.वास्तव में 2020 में प्रकाशित बोल्टन के संस्मरण में लिखा है कि उसने वार्ता के दौरान परमाणु हथियारों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ नष्ट करने की मांग की थी और जनवादी कोरियाई पक्ष ने इसका विरोध किया था बोल्टन ने अपने संस्मरण में यह भी आकलन किया कि “यदि शिखर वार्ता में समझौता हो जाता, तो यह अमेरिका के लिए एक आपदा होती.” इसलिए यह माना जा सकता है कि उन्होंने जानबूझकर वार्ता को सफल होने से रोका. अर्थात हनोई समझौते के विफल होने का कारण और जिम्मेदारी अमेरिका पर थी, यह साबित हो गया.इसके बाद जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग निष्प्रभावी हो गई. अमेरिका ने जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण का एक अच्छा अवसर गंवा दिया.

हनोई सम्मेलन के तुरंत बाद तत्कालीन जनवादी कोरियाई उप विदेश मंत्री काॅमरेड छ्वे सन ही ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर कहा था, “यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि क्या भविष्य में ऐसा अवसर फिर कभी अमेरिकी पक्ष के सामने आएगा.” दो सप्ताह बाद तास समाचार एजेंसी के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “एक बात स्पष्ट है कि अमेरिका ने इस बार सुनहरे अवसर को गंवा दिया है.” इसे देखते हुए अब ऐसा लगता है कि जनवादी कोरिया 2018 और 2019 जैसी परमाणु निरस्त्रीकरण वार्ता कभी भी, हमेशा के लिए, नहीं करेगा.

दो बार के जनवादी कोरिया-अमेरिका शिखर सम्मेलनों के माध्यम से जनवादी कोरिया ने कुछ भी छोड़े बिना अमेरिका के बराबर का देश होने की बात प्रदर्शित करने की कूटनीतिक उपलब्धि हासिल की और परमाणु हथियार रखने की वैधता भी हासिल कर ली.इसलिए यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उसने असाधारण कूटनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया.वह भी उस अमेरिका के सामने, जो स्वयं को दुनिया की सबसे शक्तिशाली महाशक्ति कहता है.

इन प्रक्रियाओं के बाद आज जनवादी कोरिया और अमेरिका के बीच बनी परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं. जनवादी कोरिया अपने परमाणु हथियारों की संख्या तेजी से बढ़ा रहा है और उन्हें अधिक उन्नत बना रहा है. जनवादी कोरिया, चीन और रूस धीरे-धीरे एकजुट हो रहे हैं. जनवादी कोरिया पर लगे प्रतिबंध प्रभावहीन हैं. ऐसी स्थिति में जनवादी कोरिया के पास 2018 और 2019 जैसी जनवादी कोरिया-अमेरिका वार्ता करने का कोई कारण नहीं है. इसके बावजूद ट्रंप अभी भी उसी समय की सोच में अटका हुआ है और उसी विषय-वस्तु तथा तरीके से बातचीत करने की कोशिश कर रहा है. इसलिए जनवादी कोरिया और अमेरिका के बीच कोई साझा बिंदु नहीं है और दोनों एक-दूसरे से मिल नहीं सकते.

इस स्थिति में जनवादी कोरिया-अमेरिका वार्ता संभव होने की केवल एक स्थिति है वह तब, जब जनवादी कोरिया और अमेरिका के बीच सैन्य टकराव इतना बढ़ जाए कि जनवादी कोरिया की परमाणु मिसाइलें अमेरिकी मुख्यभूमि पर हमला करने के बिल्कुल करीब पहुंच जाएं. ऐसी स्थिति में क्या अमेरिकी लोगों में यह संकल्प होगा कि ‘भले ही जनवादी कोरिया की परमाणु मिसाइलें अमेरिकी मुख्यभूमि पर गिर जाएं, फिर भी हम घुटने नहीं टेकेंगे’ और वे युद्ध की कीमत चुकाने के लिए तैयार हो जाएं? अमेरिका ऐसा देश है जहां पृथ्वी के दूसरे छोर पर अपने कुछ सैनिकों के मारे जाने पर भी युद्ध-विरोधी जनमत भड़क उठता है.यदि ऐसी स्थिति पैदा होती है कि जनवादी कोरिया की परमाणु मिसाइलों के अमेरिकी मुख्यभूमि पर हमला करने की संभावना सामने आ जाए, तो स्वाभाविक रूप से युद्ध रोकने की मांग करने वाला जनमत तेजी से बढ़ेगा. लोग जनवादी कोरिया के परमाणु निरस्त्रीकरण की नीति समाप्त करने और अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास रोककर जनवादी कोरिया के साथ बातचीत करने की मांग करेंगे.

यह पता नहीं है कि जनवादी कोरिया स्थिति को उस स्तर तक ले जाएगा या नहीं.लेकिन जनवादी कोरिया के दृष्टिकोण से देखें तो उसके ठीक सामने अमेरिका-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास, अमेरिका- जापान-दक्षिण कोरिया संयुक्त सैन्य अभ्यास ही नहीं, बल्कि नाटो तक आकर परमाणु हमले के अभ्यास कर रहा है.ऐसे में जनवादी कोरिया के लिए भी अमेरिका के बिल्कुल सामने, सैन फ्रांसिस्को और वॉशिंगटन के समुद्री क्षेत्र के सामने अमेरिका पर हमला कर सकने वाले अभ्यास न करने का कोई कारण नहीं है.

उदाहरण के लिए, जनवादी कोरिया अमेरिका के ठीक सामने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र को फायरिंग क्षेत्र घोषित करके अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल दाग सकता है.अमेरिका भी नियमित रूप से प्रशांत महासागर के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण करता है, तो जनवादी कोरिया ऐसा क्यों नहीं कर सकता? यदि ऐसा हुआ, तो जनवादी कोरिया से छोड़ी गई मिसाइल लगभग 30 मिनट तक उड़कर अमेरिका के सामने समुद्री क्षेत्र में गिरने तक अमेरिकी नेतृत्व अत्यंत तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच जाएगा.2025 में रिलीज हुई फिल्म 「हाउस ऑफ डायनामाइट」 में इसे अच्छी तरह चित्रित किया गया है.यदि जनवादी कोरिया ऐसा करता है, तो अमेरिका किस तरह प्रतिक्रिया देगा, यह निश्चित रूप से देखने वाली बात होगी. 





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