परजीवी अर्थव्यवस्था


दक्षिण कोरिया का नाम आते ही उसके तथाकथित “आर्थिक चमत्कार” की चर्चा जरुर की जाती है पर सच्चाई यह है कि तथाकथित "दक्षिण कोरियाई आर्थिक चमत्कार" वास्तव में कोई चमत्कार नहीं था, बल्कि यह केवल अमेरिकी साम्राज्यवाद ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन जैसे अन्य साम्राज्यवादी देशों द्वारा दिए गए भारी आर्थिक सहायता और निवेश का परिणाम था.

मूलतः दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था 1950 के दशक में अमेरिकी सहायता से प्रारंभ हुई.1960 और 1970 के दशक में विदेशी ऋणों के माध्यम से उसका विस्तार हुआ.1980 और 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के साथ उसका आकार तो बढ़ा, लेकिन उसी समय वह संरचनात्मक रूप से अमेरिका की उप-ठेका (Subcontracting) अर्थव्यवस्था बनती चली गई.

विशेष रूप से 1997 के IMF विदेशी मुद्रा संकट के बाद तेज़ी से लागू हुई नवउदारवादी वैश्वीकरण (Neoliberal Globalization) के कारण दक्षिण कोरिया की पहले से ही परजीवी रह चुकी अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह अमेरिका के अधीन चली गई.

अमेरिकी उपनिवेश दक्षिण कोरिया के प्रमुख बैंकों में विदेशी स्वामित्व सामान्यतः 60 प्रतिशत से अधिक है.

यहाँ तक कि उसके सबसे बड़े बैंक KB Financial Group में जून 2026 के अंत तक विदेशी हिस्सेदारी 80 प्रतिशत तक पहुँच गई.

दक्षिण कोरिया के बड़े औद्योगिक समूहों (Chaebol) में भी विदेशी स्वामित्व का 50 प्रतिशत से अधिक होना सामान्य बात है.

दक्षिण कोरियाई कठपुतली बैंकों और कंपनियों के शेयर रखने वाले विदेशी निवेशकों में सबसे प्रमुख स्थान अमेरिका का है.

उदाहरण के लिए, विश्व की सबसे बड़ी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी ब्लैकरॉक (BlackRock), जो अमेरिका की कंपनी है, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स के लगभग 5 प्रतिशत शेयर रखती है.

इस कारण वह एकल संस्थागत निवेशकों में  दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय पेंशन सेवा (National Pension Service) के बाद दूसरे स्थान पर है, और सैमसंग के ली जे-योंग परिवार की कुल हिस्सेदारी से भी अधिक शेयर उसके पास हैं.

इसी कारण दक्षिण कोरियाई कठपुतली राष्ट्रपति ली जे-म्योंग ने पिछले वर्ष सितंबर में अमेरिका की यात्रा के दौरान ब्लैकरॉक के अध्यक्ष लैरी फिंक से मुलाकात कर दक्षिण कोरिया की कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) कंपनियों में अधिक निवेश करने का अनुरोध किया तथा उनके साथ एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए.

इस प्रकार, हमेशा की तरह दक्षिण कोरिया ने अपने आप को एक बार फिर अमेरिका पर अत्यधिक निर्भर बना लिया .

इतना ही नहीं 23 जुलाई को अमेरिका ने 'बलात् श्रम (Forced Labor)' को आधार बनाकर दक्षिण कोरिया सहित लगभग 60 देशों पर अतिरिक्त शुल्क (टैरिफ) लगा दिया.

अमेरिका ने प्रारंभ में पारस्परिक शुल्क (Reciprocal Tariffs) लगाए थे, लेकिन संघीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उन्हें अवैध घोषित किए जाने के बाद उन्हें व्यापार अधिनियम (Trade Act) की धारा 122 के अंतर्गत आपातकालीन शुल्क से बदल दिया. जब उसकी समय-सीमा भी समाप्त हो गई, तब इस बार व्यापार अधिनियम की धारा 301 का सहारा लिया गया.

दक्षिण कोरिया ने पिछले वर्ष अक्टूबर में शुल्क विवाद के समाधान के लिए अमेरिका में 350 अरब अमेरिकी डॉलर निवेश करने पर सहमति व्यक्त की थी, और अतिरिक्त रूप से ऊर्जा खरीद के लिए 100 अरब अमेरिकी डॉलर देने का भी वादा किया था. .

यहाँ तक कि कागजों में जिसे "निवेश" कहा जा रहा है, वास्तव में वह केवल नाम का निवेश है, क्योंकि उससे होने वाले अधिकांश लाभ अमेरिका ले जाता है. इसलिए वस्तुतः यह 'लूट' के समान है.मालिक के आगे गुलाम की क्या बिसात.

दक्षिण कोरिया की अमेरिकी निर्भर आर्थिक संरचना बार-बार संकटों को जन्म देती रही है.

1997 का IMF विदेशी मुद्रा संकट अल्पकालिक विदेशी पूँजी के तीव्र पलायन से उत्पन्न हुआ था, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि दक्षिण कोरियाई परजीवी अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के प्रति कितनी संवेदनशील है.

आज दक्षिण कोरियाई समाज की अनेक समस्याएँ—

  • अस्थायी रोजगार
  • सामूहिक छँटनी
  • असीमित प्रतिस्पर्धा
  • युवाओं में बेरोज़गारी
  • संपत्ति असमानता
  • घटती जन्म दर

सबकी जड़ें उसी नवउदारवादी व्यवस्था में हैं जिसे IMF संकट के समय अमेरिका ने लागू करवाया था.

आज भी अमेरिका अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए अपने गुलाम दक्षिण कोरिया पर भारी निवेश का दबाव डाल रहा है.

साथ ही, पहले से मौजूद नाममात्र के  अमेरिका-दक्षिण कोरिया मुक्त व्यापार समझौते (KORUS FTA) को लगभग निष्प्रभावी बनाते हुए तरह-तरह के शुल्क भी लगा रहा है.

इसके अतिरिक्त, दक्षिण कोरिया द्वारा महत्वाकांक्षी रूप से आगे बढ़ाई जा रही तीन मेगा परियोजनाओं के प्रति भी अमेरिका असंतोष प्रकट करते हुए बाधाएँ उत्पन्न कर रहा है.

उसका संदेश यह है कि यदि दक्षिण कोरिया के पास निवेश करने के लिए धन है, तो उसे अपने यहाँ नहीं बल्कि अमेरिका में निवेश करना चाहिए.

विश्व भर के विरोध के बावजूद अमेरिका लगातार शुल्क नीति पर इसलिए अड़ा हुआ है क्योंकि उसकी अपनी अर्थव्यवस्था गंभीर आंतरिक संकटों का सामना कर रही है.

एक समय अमेरिका को "विश्व का कारखाना" कहा जाता था, लेकिन उसने विनिर्माण उद्योग छोड़कर वित्तीय उद्योग (वास्तव में सट्टा पूँजी के खेल) पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप उसका विनिर्माण क्षेत्र लगभग नष्ट हो गया.

राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया था कि शुल्क नीति अमेरिकी विनिर्माण उद्योग को पुनर्जीवित करेगी.

किन्तु संघीय सरकार के आँकड़ों के अनुसार जनवरी से नवंबर 2025 के बीच विनिर्माण क्षेत्र में 70,000 से अधिक नौकरियाँ समाप्त हो गईं.

अमेरिका का राष्ट्रीय ऋण अब 39 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 6 क्वाड्रिलियन वॉन) तक पहुँच चुका है, जो उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से भी अधिक है.

केवल ब्याज भुगतान ही प्रतिवर्ष 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है.

अमेरिका में आय और संपत्ति की असमानता भी अत्यंत गंभीर है.

2024 के आँकड़ों के अनुसार, शीर्ष 1 प्रतिशत लोगों के पास कुल घरेलू संपत्ति का 31 प्रतिशत है, जो OECD देशों में सबसे ऊँचे स्तरों में से एक है.

हाल के वर्षों में अमेरिकी उपभोक्ता बाजार दो ध्रुवों में विभाजित होता जा रहा है—

  • अत्यंत सस्ते डिस्काउंट स्टोर
  • अत्यंत विलासितापूर्ण उपभोग

इस प्रवृत्ति को "K-आकार का ध्रुवीकरण (K-shaped Polarization)" कहा जाता है.

27 दिसंबर 2025 के वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, 2025 में अमेरिकी कंपनियों के दिवालिया होने की संख्या 2010 (वैश्विक वित्तीय संकट के बाद) के बाद सबसे अधिक रही.

S&P Global Market Intelligence के अनुसार जनवरी से नवंबर 2025 के बीच कम-से-कम 717 कंपनियों ने दिवालियापन के लिए आवेदन किया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 14 प्रतिशत अधिक था.

अमेरिका इस आर्थिक संकट से निकलने के लिए दक्षिण कोरिया जैसे अपने उपनिवेशों के अलावा पूरी दुनिया पर शुल्क थोप रहा है, अन्य देशों को अमेरिका में निवेश करने के लिए बाध्य कर रहा है तथा विश्व के विभिन्न भागों में युद्ध और आर्थिक लूट की नीति अपना रहा है.

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