72सालों से जारी है गुलामी की दास्ताँ


 

27 जुलाई 1953 को फानमुनजम में हस्ताक्षरित कोरियाई युद्ध का युद्धविराम समझौता युद्ध को समाप्त करने वाला दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि केवल युद्ध को अस्थायी रूप से रोकने वाला एक काग़ज़ी समझौता था. और अब उसके 72 वर्ष बीत चुके हैं. वह अस्थायी वादा अब स्थायी रूप ले चुका है, और उसी दरार के बीच संयुक्त राष्ट्र कमान (UNC, यूनाइटेड नेशंस कमांड) नामक संस्था ने स्वयं को “प्रबंधक” बताते हुए कोरियाई प्रायद्वीप सटीक रूप से कहें तो उसके दक्षिणी हिस्से यानि की दक्षिण कोरिया के ऊपर शासन किया है.


17 दिसंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र कमान ने दक्षिण कोरिया की कठपुतली सरकार द्वारा निरस्त्रीकृत क्षेत्र (DMZ) में असैन्य पहुँच प्रदान करने के प्रयास का सार्वजनिक रूप से विरोध करते हुए एक बयान जारी किया. यह दृश्य स्पष्ट करता है कि 72 वर्षों से चला आ रहा प्रभुत्व का ढाँचा आज भी जारी है.

संयुक्त राष्ट्र कमान अपने बयान में दावा करती है कि उसने 1953 के बाद से DMZ का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया है. यह सत्ता का कितना निर्लज्ज आत्म-प्रचार है. युद्धविराम समझौते के अनुच्छेद 1 की धारा 9 और 10 का बार-बार हवाला देते हुए वह कहती है कि “सैन्य सीमारेखा के दक्षिण में स्थित DMZ के नागरिक प्रशासन और राहत की जिम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र सेना के कमांडर की है.” इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र कमान स्वयं को मानो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी वैधता से युक्त एक निष्पक्ष संस्था के रूप में प्रस्तुत करती है.
लेकिन वास्तविकता यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने कभी भी संयुक्त राष्ट्र कमान को एक स्वतंत्र यूएन संस्था के रूप में मान्यता नहीं दी. संयुक्त राष्ट्र कमान किसी सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का परिणाम नहीं थी, बल्कि अमेरिकी सैन्य कमान संरचना को अंतरराष्ट्रीय आवरण पहनाने का एक साधन थी. यह तथ्य 1975 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 3390B के माध्यम से पहले ही स्पष्ट हो चुका था, जिसमें संयुक्त राष्ट्र कमान के विघटन और शांति व्यवस्था में परिवर्तन की सिफारिश की गई थी.

इसके बावजूद, अमेरिका आज भी “संयुक्त राष्ट्र” नाम का उपयोग करते हुए दक्षिणी कोरिया में प्रवेश को नियंत्रित कर रहा है. एकीकृत मंत्रालय के मंत्री  छंग दोंग यंग द्वारा इस तथ्य को सार्वजनिक किए जाने से उत्पन्न विवाद प्रतीकात्मक है. दक्षिण कोरिया के उच्चस्तरीय सुरक्षा अधिकारी  तक को DMZ में प्रवेश के लिए संयुक्त राष्ट्र कमान से अनुमति लेनी पड़ी, और अंततः संयुक्त राष्ट्र कमान ने DMZ में उसके प्रवेश को  इनकार कर दिया. ये तो कुछ भी नहीं है दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति तक को DMZ में प्रवेश के लिए संयुक्त राष्ट्र कमान से अनुमति लेनी पड़ती है.
जिस देश का सर्वोच्च सैन्य नेतृत्व अपने ही भूभाग में प्रवेश नहीं कर सकता, वह स्थिति इस बात को साफ कर देती है कि दक्षिण कोरिया का असली मालिक कौन है और उसकी अपनी कोई संप्रभुता वास्तव में है भी की नहीं.

संयुक्त राष्ट्र कमान का कहना है कि उसकी शक्तियाँ “युद्धविराम समझौते के तहत बाध्यकारी ढाँचे” से आती हैं. लेकिन युद्धविराम समझौते के पक्षकार जनवादी कोरियाई जनसेना, चीनी जनस्वयंसेवी सेना और संयुक्त राष्ट्र सेना के कमांडर थे. दक्षिण कोरिया न तो उस समझौते का हस्ताक्षरकर्ता था और न ही उसके पास कोई अधिकार था.


इस विडंबनापूर्ण संरचना के भीतर, दक्षिण कोरिया एक ऐसे समझौते के कारण जिसका वह पक्षकार ही नहीं था. 70 वर्षों से अधिक समय से संप्रभु देश नहीं है .इसके अलावा, चीनी जनस्वयंसेवी सेना 1994 में सैन्य युद्धविराम आयोग से हट गई, और जनवादी कोरिया ने भी उस आयोग को अमान्य घोषित कर दिया. परिणामस्वरूप वह ढाँचा वस्तुतः समाप्त हो गया—लेकिन उस खालीपन को शांति ने नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र कमान ने भर लिया.

संयुक्त राष्ट्र कमान अपने बयान में यह भी स्वीकार करती है कि DMZ प्रबंधन की मुख्य जिम्मेदारियाँ दक्षिण कोरियाई सेना निभा रही है—चाहे वह सुरक्षा बनाए रखना हो, चिकित्सा निकासी हो या आधारभूत ढाँचे का समर्थन. इसका अर्थ यह है कि प्रबंधन की लागत और जोखिम  गुलाम दक्षिण कोरिया उठाता है, जबकि निर्णय और अनुमोदन का अधिकार संयुक्त राष्ट्र कमान, और अधिक सटीक रूप से कहें तो अमेरिकी सेनाओं के दक्षिण कोरिया स्थित कमांडर, के हाथ में है.

संयुक्त राष्ट्र कमान प्रारंभ से ही कोरियाई युद्ध का अवशेष और शत्रुतापूर्ण नीति का प्रतीक रही है. युद्धविराम व्यवस्था जितनी लंबी खिंचती गई, शांति समझौता उतना ही टलता गया, और शांति जितनी टलती गई, सैन्य नियंत्रण उतना ही अमेरिका के हाथों में जड़ जमा गया.


72 वर्षों बाद अब जब कठपुतली दक्षिण कोरियाई सरकार के भीतर से भी DMZ के शांतिपूर्ण उपयोग के लिए न्यूनतम विधायी प्रयास किए जा रहे हैं, तब भी “चिंता” के नाम पर उन पर रोक लगाई जा रही हैयह दर्शाता है कि यह ढाँचा आसानी से सुलझने वाला नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र कमान अपने बयान के अंत में “स्थायी शांति संधि के प्रति आशावादी उम्मीद” की बात करती है. लेकिन 72 वर्षों से “उम्मीद” शब्द केवल घोषणाओं तक ही सीमित रहा है. संयुक्त राष्ट्र कमान ने अपनी शक्तियाँ एक बार भी छोड़ी नहीं हैं.
यदि जो व्यक्ति आशा की बात करता है वही उस आशा की ओर जाने वाले द्वार की चाबी पकड़े हो, तो उसकी आशा एक वचन नहीं बल्कि एक बंधक बन जाती है.

DMZ केवल एक सैन्य बफ़र ज़ोन नहीं है, बल्कि विभाजन के घावों से भरा हुआ एक स्थान है. जब तक उस स्थान तक पहुँच का अधिकार स्वयं दक्षिण कोरियाई सरकार तय नहीं कर सकती, तब तक यह भ्रम न पालें कि दक्षिण में कोई वास्तविक “संप्रभुता” मौजूद है.


संयुक्त राष्ट्र कमान के मुखौटे के पीछे अमेरिका द्वारा किया जा रहा यह पुराना शासन अब “स्थिरता” शब्द से ढका नहीं जा सकता. शांति को प्रबंधित नहीं किया जाता, वह केवल संप्रभुता के आधार पर ही संभव है. और वह संप्रभुता अभी तक वापस नहीं आई है.

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